ममता मलय के एप्लिकेशन पर लार्जर बेंच का फैसला आज

सन्मार्ग संवाददाता
कोलकाता : मुख्य मंत्री ममता बनर्जी, कानून मंत्री मलय घटक और राज्य सरकार की तरफ से हाई कोर्ट में दायर एप्लिकेशन पर मंगलवार को सुनवायी पूरी हो गई। सुप्रीम कोर्ट ने एपिल्केशन देने का आदेश दिया था। एक्टिंग चीफ जस्टिस राजेश बिंदल, जस्टिस आईपी मुखर्जी, जस्टिस हरीश टंडन, जस्टिस सौमेन सेन और जस्टिस अरिजीत बनर्जी के लार्जर बेंच ने दोनों पक्षों को सुनने के बाद कहा कि अपना आदेश बुधवार को सुनाएंगे।
मामले की सुनवायी शुरू होते ही एडवोकेट जनरल (एजी) किशोर दत्त ने सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस विनीत सरण के डिविजन बेंच के 25 जून के आदेश की जानकारी लार्जर बेंच को दी। एजी ने बहस करते हुए कहा कि कानून और व्यवस्था राज्य सरकार में निहीत है और इससे किसी ने इनकार नहीं किया है। उन्होंने कहा कि यह मामला कुछ तथ्यों पर आधारित है और उन्हीं को लेकर यह सवाल उठाया गया है। एजी ने कहा कि रूल्स के मुताबिक हमें चार सप्ताह बाद भी एफिडेविट दाखिल करने का अधिकार है। इस पर जस्टिस बिंदल ने सवाल किया कि क्या सुनवायी समाप्त होने के चार सप्ताह बाद भी एफिडेविट दाखिल कर सकते हैं। क्या इस बाबत कानून की व्याख्या इसी तरह की जानी चाहिए। इस दौरान जस्टिस आईपी मुखर्जी ने कहा कि इस तरह के महत्वपूर्ण मामले में क्या प्रक्रियागत मुद्दों पर इस तरह समय बर्बाद किया जा सकता है। इस तरह आम लोगों को न्यायालय के कामकाज के बाबत क्या संदेश दे रहे हैं। उन्होंने कहा कि एडवोकेट जनरल और सालिसिटर जनरल दोनों को इस पर‌ विचार करना चाहिए। मुख्यमंत्री की तरफ से बहस करते हुए एडवोकेट राकेश द्विवेदी ने कहा कि दो घटनाओं को ले कर यह आरोप लगा है। एक सीबीआई कार्यालय की है और दुसरी सीबीआई के स्पेशल कोर्ट की है। ये दोनों घटनाएं सीसीटीवी फुटेज से साबित की जा सकती हैं। सीबीआई ने अपने कार्यालय का सीसीटीवी फुटेज क्यों नहीं पेश किया है। उन्होंने कहा कि सीबीआई को इसका (एफिडेविट) विरोध नहीं करना चाहिए क्योंकि यह ऐसा कुछ नहीं है जिससे सीबीआई को व्यक्तिगत रूप से कोई क्षति हो रही हो। जस्टिस टंडन ने कहा कि मुख्यमंत्री और कानून मंत्री इस मामले में अभियुक्त नहीं हैं सिर्फ भीड़तंत्र के कारण उन्हें इसमें जोड़ा गया है। एडवोकेट द्विवेदी ने कहा कि अगर एफिडेविट गलत है तो कोर्ट के पास कॉस्ट लगाने का अधिकार तो रहता ही है। सालिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि जब उनकी बहस समाप्त हो गई तब उन्होंंने एफिडेविट दाखिल‌ करना चाहा। जस्टिस मुखर्जी ने सवाल किया कि यह एफिडेविट स्वत:स्फुर्त दाखिल किया गया या सोचने समझने के बाद, क्या इस पर विचार दाखिल किये जाते समय किया जाना चाहिए या रिकार्ड में दर्ज करने के बाद। सालिसिटर जनरल ने कहा कि अगर उनके और अभियुक्तों की तरफ से बहस पूरी होने के बाद भी इसे रिकार्ड में लिया जाता है तो यह संदेश जाना चाहिए कि न्यायिक प्रक्रिया को हल्के से नहीं लिया जाए।

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