कोलकाताः विभाग की गलती के कारण पेंशन से वंचित हैं लांस नायक

पाकिस्तान और चीन के दांत खट्टे किये थे लांस नायक ने
सन्मार्ग संवाददाता
विधाननगर : सन् 1962 एवं 1965 की लड़ाई में चीन और पाकिस्तान के दांत खट्टे कर देने वाले लांस नायक लोक बहादुर मल्ला डिपार्टमेंट की एक गलती के कारण पूर्व सैनिक के सभी सुख-सुविधाओं से वंचित होकर आज दाने-दाने को मोहताज हो गए हैं। वह गोरखा रेजिमेंट मे कार्यरत थे। नेपाल के धौलागिरी क्षेत्र में रहने वाले लोक बहादुर मल्ला ने 15 नवंबर 1956 में भारतीय सेना में शामिल होकर भारत की सेवा के साथ अपनी जिंदगी संवारने का सपना देखा था। इस बीच 1962 एवं 1965 में चीन व पाकिस्तान से उन्होंने लड़ाई लड़ी। कश्मीर के द्रास सेक्टर में 7 दिसंबर 1965 को पाकिस्तान से लड़ाई करते हुए पाकिस्तान को तो हरा दिया लेकिन माइनस 15 डिग्री के ठंड में लड़ाई करते हुए वह बेहोश हो गए। इसके बाद भारतीय सेना ने उन्हें बरामद कर श्रीनगर बेस कैंप 15 डिविजन में लाया जहां 8 दिन तक उनका इलाज चला। बाद में उन्हें होश आया। 30 दिसंबर को डिस्चार्ज होने के बाद 3 जनवरी को अखनूर सेक्टर में तैनात अपने प्लाटून में पहुंच गए । यहां 11 जनवरी तक उन्होंने काम किया। इस बीच 12 जनवरी को रात 12:00 बजे ताशकंद में तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री एवं जनरल अयूब खान ने युद्ध विराम के फाइल पर हस्ताक्षर किया एवं लड़ाई रुक गई। 12 जनवरी 1966 को सेना के उच्च अधिकारियों ने जिन सेना कर्मियों को छुट्टी चाहिए उन्हें 2 महीने के लिए छुट्टी मंजूर करने की बात कही, जिसे देखते हुए लांस नायक लोक बहादुर मल्ला ने भी 2 महीने छुट्टी के लिए हाथ उठाया एवं उनकी छुट्टी मंजूर हो गई । इसके बाद वहां से पठानकोट पहुंच उन्होंने गोरखपुर के लिए ट्रेन पकड़ ली एवं वहां से वह नेपाल अपने पैतृक गांव चले गए। 2 महीना छुट्टी बिताने के बाद उन्होंने अपने बटालियन से संपर्क किया तो उन्हें पता चला कि उनकी बटालियन देहरादून में तैनात है। उन्होंने 3 मार्च 1966 को अपनी बटालियन में रिपोर्ट किया लेकिन उनका शरीर दिन-ब-दिन खराब होता गया और वह सेना में काम करने में असमर्थ महसूस कर रहे थे। उन्होंने विभाग के अधिकारी को इस बात से अवगत करवाया जिसके बाद 1967 में उन्होंने सेना की नौकरी अस्वस्थता के कारण छोड़ दी, लेकिन उनका आरोप है कि मैं युद्ध के दौरान गंभीर रूप से शारीरिक तौर पर अस्वस्थ हो चुका था इसलिए मुझे मेडिकल ग्राउंड पर विभाग छोड़नी चाहिए थी, ताकि मैं रिटायर के बाद सरकारी सभी सुविधा मुझे मिल सके। इसमें पेंशन भी शामिल है लेकिन डिपार्टमेंट के ऑफिसर ने फाइल में यह लिख दिया कि मैं अपने इच्छा से नौकरी छोड़ रहा हूं। इस कारण 11 साल से अधिक समय तक देश की सेवा करने के बावजूद पेंशन सहित सभी तरह के रिटायरमेंट के बाद मिलने वाली सुविधाओं से वंचित हो गया। इस विषय को लेकर बार-बार विभाग के अधिकारियों को अवगत करवाया गया है लेकिन विभाग कोई ना कोई बहाना बनाते हुए विषय को टालता रहा। आज 85 वर्ष की आयु में अब जीना दुश्वार सा महसूस हो रहा है, कारण आर्थिक तंगी के कारण पूरा परिवार ही बिखर चुका है । इसलिए सरकार से मांग है कि अविलंब मेरा रिटायरमेंट के बाद मिलने वाले सभी सुविधाओं को प्रदान करे एवं पेंशन चालू करे, नहीं तो दिन-ब-दिन मैं आर्थिक एवं मानसिक तौर पर बदहाल होता जा रहा हूं । इस विषय को लेकर वे विभाग के अधिकारी के साथ साथ प्रधानमंत्री को भी पत्र लिख चुके हैं लेकिन किसी ने नहीं सुनी। देश के लिए मर मिटने का कसम खाने के बावजूद आज उन्हें कुछ भी खाने को नहीं मिल रहा।

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