…..और उनकी आंखों से झरझर आंसू बहने लगे

जज ने कहा कि वे बस्ती के बच्चों के स्कूल का मुआयना करेंगे
सन्मार्ग संवाददाता
कोलकाता : एक गजल का कतरा है : कौन कहता है कि आसमान में सूराख हो नहीं सकता, एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारो। जागृति विद्यापीठ के अध्यापक और अध्यापिकाओं ने ठान लिया था कि बस्ती के बच्चों वाले इस स्कूल को जिंदा रखने के साथ ही अपना डेढ़ साल का बकाया वेतन भी वसूलेंगे।
एडवोकेट कमलेश भट्टाचार्या ने बताया कि कुछ लोगों ने 1970 में एक ट्रस्ट बना कर इस स्कूल की स्थापना की थी और बस्ती के बच्चे इस स्कूल में पढ़ते हैं। सब कुछ ठीक-ठाक चल रहा था पर 2015 में सत्ता में आयी नयी कमेटी ने फैसला लिया कि इस स्कूल के साथ ही अंग्रेजी माध्यम का एक स्कूल भी खोला जाएगा। इसके बाद एक राष्ट्रीयकृत बैंक में अलग से एक खाता खोला गया। लोगों से मिली रकम के साथ ही स्कूल के सारे फंड भी इस खाते में ट्रांसफर कर दिए गए। जब 2019 में नयी कमेटी आयी तो उसने पुरानी कमेटी पर घपला करने का आरोप लगाते हुए हाई कोर्ट में रिट दायर कर दी। हाई कोर्ट ने बैंक खाते को फ्रीज कर दिया। नतीजा यह हुआ कि करीब नौ सौ बच्चों वाले इस स्कूल के 18 अध्यापक-अध्यापिकाओं का वेतन रुक गया। पर इन्होंने हार नहीं मानी और स्कूल को जारी रखा। यहां तक कि मिड डे मील का इंतजाम भी इन टीचरों ने किया। जस्टिस अभिजीत गंगोपाध्याय ने इस मामले की जांच करके इसकी रिपोर्ट देने का आदेश दिया। रिपोर्ट मुआफिक थी और अब फैसला सुनाने की बारी थी। जब जस्टिस गंगोपाध्याय फैसला सुना रहे थे तो कोर्ट रूम में दम बांधे छह अध्यापिकाएं खड़ी थी। फैसला सुनते ही उनकी आंखों से झरझर आंसू बहने लगें, क्योंंकि फैसला उनके पक्ष में था। उन्होंने बैंक खाते पर लगी पाबंदी हटा ली। जस्टिस गंगोपाध्याय इस स्कूल से इस कदर प्रभावित हुए कि उन्होंने अध्यापिकाओं से कहा कि वे स्कूल का मुआयना करने आएंगे।

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