दो सालों बाद सजी ढाक की धुन, पंडालों में पहुंचे ढाकी

सन्मार्ग संवाददाता
काेलकाता : ढाकी की धुन और धुनुची नृत्य से पूजा का उत्साह चरम पर होता है। देखा जाये तो दुर्गापू​जा में बिना ढाक के उत्साह व रौनक नहीं आती है, इसलिए हर पंडाल में ढाक की धुन खूब सुनायी देती है। इस बार की बात ही अलग है। ढाकियों का कहना है कि दो सालों बाद इस बार ढाक की धुन खूब सजी है। बड़े पैमाने पर पूजा नहीं होने के कारण दो सालों में ढाक की रस्में पूरी नहीं हुईं मगर इस बार हर एक आयोजक पंचमी से ही पंडालों में ढाकियों को बुलाने लगे हैं। शुक्रवार को विभिन्न जिलों से ढाकी सियालदह पहुंचे तथा वहां से अपने – अपने पंडालों के लिए रवाना हुए। उनका कहना था कि इस बार आयोजकों में भी उत्साह खूब है।
विदेश तक गये बंगाल के ढाकी
बंगाल की दुर्गा पूजा अपने आप में विशेष है। ढाक एक ऐसा वाद्य यंत्र है जो सिर्फ बंगाल की दुर्गापूजा में खास तौर पर बजाया जाता है। पंडालों में ढाक बजाने के लिए ग्रामीण इलाकों से ढाकियों को बुलाया जाता है। इसके बाद दुर्गापूजा समाप्ति के बाद इन्हें ससम्मान पैसे देकर विदा किया जाता है। उत्तर 24 परगना के मसलंदपुर के विख्यात ढाकी गोकुल चंद्र दास ने कहा कि इस बार ढाकी बंगाल के बाहर असम, झारखंड यहां तक कि देश से बाहर विदेश भी गये हैं। दो सालों में उस तरह ढाकियों की मांग नहीं थी मगर इस बार फिर ढाकियों के चेहरे पर रौनक है।

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