आईएएस नहीं बने; चलो छत से कूद पड़ो!

यहChaitanya Pic शीर्षक आपको क्रूर और असंवेदनशील लग सकता है। पर प्रतियोगी परीक्षाओं में पराजित होने वाले बच्चे जब खुदकुशी करते हैं, तो उनके कानों में यही शब्द गूंजते होंगे। भले ही उनके मां-बाप और टीचर्स इन्हीं शब्दों में यह बात न कहें, पर उनकी देहभाषा, उनके हाव भाव बच्चों को यही संदेश देते हैं कि अब वे कहीं के न रहे। दुनिया के सारे रास्ते बंद दिखाई देते होंगे और खुद के प्राण ले लेना ही एकमात्र समाधान के रूप में नजर आता होगा। कहीं कोई सहानुभूति, करुणा के संकेत नहीं मिलते होंगे। बस हर जगह सवाल पूछती भूखी, निर्दयी आंखें दिखती होंगी: “क्यों, पास नहीं हुए नालायक? तुमसे और उम्मीद ही क्या थी? फलां को देखा, तुमने तो नाम ही डुबो दिया अपने मां बाप का।” अपनी संतुष्टि और उपलब्धि के लिए अपने बच्चों का इस्तेमाल करने वाले माता-पिता की क्रूरता का एक स्पष्ट उदाहरण हैं निर्मम प्रतिस्पर्द्धा का वातावरण और उसके दबाव में आत्महत्या करने वाले युवक-युवतियां।
इम्तहान में मिले अंकों के आधार पर किसी बच्चे की प्रतिभा का सही आकलन हो सकता है? नहीं। यह एक बहुत ही परंपरावादी और बासी तरीका है। इसमें एक तरह की क्रूरता है। बौद्धिक क्षमता के आकलन का ऐसा आधार शायद ही किसी भी विकसित देश में नहीं अपनाया जाता होगा। हाल ही में देश की सर्वोच्च प्रतियोगी परीक्षा भारतीय प्रशासनिक सेवा यानी आईएएस में सर्वोच्च स्थान प्राप्त करने वाली टीना डाबी को सिविल सर्विसेज की परीक्षा में मात्र 52.49 प्रतिशत अंक ही मिले। इस बीच सिविल सेवा के प्रति दीवानगी दिनों-दिन बढ़ती जा रही है। स्कूल, कॉलेज ओर यूनिवर्सिटी में सफलता हासिल करने वाले अधिकतर छात्र-छात्राएं आईएएस बनने की इच्छा व्यक्त करते हैं। खासकर उन प्रदेशों में जहां औद्योगिक विकास कम या नहीं के बराबर है। मुंबई और कोलकाता जैसे शहरों में आप आईएएस के लिए ऐसा भेड़ियाधसान नहीं देखेंगे। वहां छात्र सीए, कास्ट एकाउंटेंसी जैसे कोर्स करते हैं और अक्सर वहां नौकरियां पा जाते हैं, जहां बड़े उद्योगों के दफ्तर होते हैं। और भी कई मौके उन्हें निजी और असंगठित क्षेत्रों में मिल जाते हैं। प्रशासनिक सेवा का आकर्षण छोटे शहरों और जिलों में ज्यादा है। डी.एम की लाल-नीली बत्तियां और सियार की तरह चीखती गाड़ियां इन जगहों पर ज्यादा दिखती हैं। साथ में चलने वाले सेवादार और बंदूकची युवाओं में ताकत और सम्मान के लिए एक ललक पैदा कर देते हैं और वे खुद को झोंक देते हैं इस तरह के पदों तक पहुंचने के प्रयास में। इन प्रशासनिक परीक्षाओं में सफल होने वाले परीक्षार्थी बुद्धि में सामान्य विद्यार्थी से कहीं ऊपर होते हैं यह सही नहीं। इनका महत्व इसलिए है क्योंकि विषमता को बढ़ाने वाले सामाजिक मूल्यों के हिसाब से इनमें धन, शोहरत कमाने की क्षमता ज्यादा होती है। विवाह के बाजार में आईएएस की धुआंधार कीमत लगती है। आईएएस हमारे उत्तर औपनिवेशिक युग का नया देवता है। हर छोटी-बड़ी चीजों का देवता, गॉड ऑफ स्माल थिंग्स-धन, सत्ता और शोहरत का मालिक, आधुनिक मध्यम वर्ग का सुपर हीरो! पर अंग्रेजों के जमाने के आईसीएस से वह किसी मामले में अलग नहीं। उन आईसीएस अधिकारियों के बारे में कहा जाता था कि वे न ही भारतीय (इंडियन) हैं, न ही सिविल (विनम्र) और न ही नौकर (सर्वेंट)। अभी कुछ दिन पहले सोशल मीडिया पर एक जिलाधिकारी की तस्वीर वायरल हुई थी जिसमें कलेक्टर साहब किसी मरीज का हाल पूछ रहे थे और अपने जूते उन्होंने मरीज की बेड के ऊपर रखे थे!
स्कूल के स्तर पर उत्तीर्ण होने वाले छात्रों का प्रतिशत बढ़ते-बढ़ते अब 98 और 99 प्रतिशत तक पहुंच चुका है। देश के अनेक कॉलेजों में तो 95 प्रतिशत से कम अंक अर्जित करने वाले प्रवेश ही नहीं पा सकते हैं। बोर्ड की परीक्षाओं के जो नतीजे विभिन्न राज्यों से मिल रहे हैं, उनमें 90 प्रतिशत के ऊपर अंक प्राप्त करने वाले विद्यार्थियों की संख्या लाखों में है। इन्हीं में से कुछ आगे चलकर आईएएस या अन्य प्रशासनिक सेवा में चुने जाते हैं। जो परीक्षार्थी आईएएस की प्रतिस्पर्द्धा में कामयाब नहीं हो सके, उनके लिए दुनिया खत्म नहीं हो जाती, यह उन्हें समझाने वाला कोई है?। उनमें से कुछ तो समय के साथ खुद को समायोजित करते हुए अपने हुनर का कहीं न कहीं उपयोग कर लेते हैं, पर कई कुंठाग्रस्त होकर जीवन भर निराश होकर घूमा करते हैं। ऐसे कितने सिविल सर्विसेज के लिए आतुर प्रत्याशियों को असफलता की चट्टान तले पिसते हुए देखा है। किसान पिता उधार लेकर, खेती-बाड़ी में जुतकर बच्चे को इलाहाबाद, दिल्ली, कोटा या दूसरे शहर भेजता है और बेटा या बेटी साल दर साल लगे रहते हैं ‘सिविल की तैयारी’ में। अधिकांश के लिए न नौ मन तेल होता है, न राधा नाचती है। हर एक सफल प्रत्याशी के पीछे लाखों अश्रुपूरित नेत्र और कुंठित मन होते हैं। सिस्टम ही ऐसा है। आगे बढ़ने के लिए कितनों को पीछे धकियाना पड़ता है। क्रूर और आत्मकेंद्रित होना पड़ता है।
जे कृष्णमूर्ति ने व्यंग्य करते हुए लिखा है कि उन्होंने तीन बार कैंब्रिज के लिए इम्तहान दिया और हर बार असफल होने में सफल रहे! गणितज्ञ श्रीनिवास अायंगर रामानुजन 12वीं में दो बार फेल हुए। महात्मा गांधी व आइंस्टीन दोनों ही पढ़ाई में औसत थे। आइंस्टीन को तो मंदबुद्धि बालक माना जाता था। वह खुद भी अपने शिक्षकों को संदेह की नजर से ही देखते थे, सिर्फ बारह वर्ष की उम्र से ही। आज उन्हें फादर ऑफ मॉडर्न फिजिक्स कहा जाता है। गांधी जी बैरिस्टर बने, पर उनके काम आया कुछ और ही! बैरिस्टरी धरी की धरी रह गयी और गांधी दुनिया की सबसे बड़ी ताकत से भिड़ने वाले योद्धा बन गए। गुरुदेव टैगोर ने स्कूलों का मजाक उड़ाया, चार्ल्स डिकेन्स ने उन्हें जेलों से बदतर बताया। शिक्षा व्यवस्था ने कितने जीनियस पैदा किये, इतिहास गवाह है! बिल गेट्स का कहना है कि मैं एक बार किसी परीक्षा में फेल हुआ, पर मेरा दोस्त पास हो गया। आज वह माइक्रोसॉफ्ट में इंजीनियर है और मैं माइक्रोसॉफ्ट का मालिक!
परीक्षा केंद्रित व्यवस्था बहुत ही संकीर्ण होती है। प्रज्ञा कई तरह की होती है, कई स्तर पर काम करती है। शिक्षा का मुख्य उद्देश्य यही होना चाहिए कि छात्र अपनी प्रतिभा को पहचान सके और उसके शिक्षक, माता-पिता उसकी मदद करें। रूसो ने कई वर्ष पहले ही कहा था कि शिक्षक को ‘परदे के पीछे रहना चाहिए’ और बच्चे पर नजर भर रखनी चाहिए, ताकि वह उसे समझ सके। अब तो बच्चों के दिमाग में यह ठूंस ठूंस कर भर दिया जाता है कि उन्हें अपने ही भाई बहनों, अपने ही मित्रों को धकेल कर, उन्हें धूल धूसरित करके आगे बढ़ना है, किलर इंस्टिंक्ट के साथ। दूसरों को हराओ, खुद आगे बढ़ो; यही सिद्धांत है आज की शिक्षा का। इसके पीछे है नफरत, स्वार्थ और ‘दूसरों’ को पछाड़ने की टुच्ची प्रवृत्ति।
विडंबना है कि जब भी दसवीं, बारहवीं या किसी बड़ी प्रतियोगी परीक्षा के परिणाम आने लगते हैं, अचानक देश में खुदकुशी करने वालों की तादाद बढ़ जाती है। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के अनुसार वर्ष 2012 से 2014 के बीच 22,319 विद्यार्थियों ने आत्महत्या की। हर साल औसतन 7,460 छात्रों ने जहर खाकर, फांसी का फंदा लगाकर, छत से कूदकर या रेल से कटकर जान दे दी। प्रति दिन के हिसाब से मरने वाले मासूम छात्रों का आंकड़ा बीस से ऊपर बैठता है। जिस समाज में सफलता की पूजा होने लगे, वहां जाने अनजाने में बच्चों से सफलता की मांग करने वाले शिक्षक, मां बाप, सभी मुखौटे लगाये हुए हत्यारे बन जाते हैं। ये आत्महत्याएं उनके दबाव की वजह से ही होती हैं। गौरतलब है कि 15-29 वर्ष के आयु वर्ग में आज पूरी दुनिया में सर्वाधिक आत्महत्या की वारदात हिंदुस्तान में होती है। एसोचैम द्वारा दस बड़े शहरों में कराए गए अध्ययन से इस बात को और बेहतर ढंग से समझा जा सकता है। इसके मुताबिक दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, चेन्नई, बेंगलुरु, जयपुर, हैदराबाद, अहमदाबाद, लखनऊ और चंडीगढ़ में प्राइमरी कक्षा के 87 फीसदी और सेकेंडरी स्तर के 95 प्रतिशत बच्चे ट्यूशन पढ़ते हैं। मतलब यह कि स्कूल जाने वाले हर बच्चे के लिए ट्यूशन पढ़ना जरूरी हो गया है, भले ही मां-बाप को इसके लिए कर्ज लेना पड़े। उम्मीद की जानी चाहिए कि सरकार टुच्ची सियासत से ऊपर उठकर इस मामले पर गंभीरता से ध्यान देगी ताकि देश के बच्चों का जीवन सहज और तनावमुक्त रहे।

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