आसनसोल का बंद सेनरेले साइकिल कारखाना बन गया मैदान

raleigh_all_chrome आसनसोलः (संवाददाता द्वारा) एशिया में कभी दूसरे स्थान पर रहा आसनसोल का सेनरेले साइकिल कारखाना कब का बंद होकर धीरे-धीरे उजाड़ होने के बाद आज एक वीरान जगह में तबदील हो चुका है। कहा जा सकता है कि आज इस जगह पर खुला मैदान है जहां किसी भी बड़े स्पोर्ट्स प्रतिस्पर्द्धा का आयोजन किया जा सकता है। वहीं यह भी है कि लगभग दो दशक पहले इस जगह पर आए लोग आज दोबारा यहां आए तो एक बार वे घबरा ही जाएंगे कि कौन-सी नई जगह आ गए। उल्लेखनीय है कि जब यह कारखाना चालू अवस्था में था तो यह सेनरेले साइकिल कॉरपोरेशन इंडिया लिमिटेड कारखाना के नाम से जाना जाता था। भारत की पूर्व प्रधानमंत्री स्व. इंदिरा गांधी ने आसनसोल के सेनरेले साइकिल कॉरपोरेशन इंडिया लिमिटेड का 1972 में राष्ट्रीयकरण किया था। इसका पुराना नाम सेनरेले था। गौरतलब है कि कोलकाता निवासी सेन एवं लंदन निवासी रेले ने मिल कर यह कारखाना खोला था। उस समय साइकिल का नाम रेले एवं कंपनी का नाम सेनरेले हुआ करता था। इसके राष्ट्रीयकरण के समय 1972 में कारखाना के गेट के सामने इंदिरा गांधी का एक बड़ा-सा स्टैच्यू बनवाया गया था। उसके बाद से सन् 2000 तक साइकिल कारखाना पूरे रफ्तार में चला। उस समय पूरे एशिया में सेनरेले साइकिल दूसरे स्थान पर थी और हर जगह इसकी मांग थी मगर, इसे राजनीति का ग्रहण लग गया जो आज तक नहीं हटा। उल्लेखनीय है कि उस समय राज्य में वामपंथी शासन था। राजनीतिक कारणों से बाध्य होकर सेनरेले कंपनी को सन् 2005 में बंद करना पड़ा था। इस दौरान बंगाल में बहुत सारे कल-कारखाने राजनीतिक कारणों से बंद हो गए और लोगों का मोह राजनीतिज्ञों से भंग होने लगा। दूसरी ओर कल-कारखानों के बंद होने से राज्य की आर्थिक दशा पर प्रभाव पड़ने लगा तो ऐसे बंद कल-कारखानों को खुलवाने की अथक कोशिश की गई। मगर सारी कोशिश बेकार गई। कारखाना नहीं खुला तो नहीं खुला। ऐसे में लाजिमी था कि चोर-उचक्कों की नजर बंद कारखाना के भीतर बेकार पड़े कल-पुर्जों पर पड़ती। बस रात के अंधेरे में कल-पुर्जे गायब होने लगे। सुरक्षा कर्मियों को डरा-धमका कर बड़ी-बड़ी मशीनें गायब होने लगीं और लोहा चोर व माफिया की लॉटरी निकल गई। स्थानीय सूत्रों के अनुसार रात में बड़े-बड़े ट्रकों में यहां के सामान चोरी होने लगे और किसी की हिम्मत नहीं होती थी कि कोई चूं तक बोले। लोगों को डराने के लिए बीच-बीच में बमबाजी कर दी जाती थी। और एक दिन ऐसा आया जब पूरे कारखाने की जगह किसी खाली मैदान की तरह सपाट हो गई। यहां तक कि ईंट-पत्थर भी शेष नहीं बचे। आज इस कारखाने की जमीन एक खुला मैदान है। सेनरेले साइकिल कारखाना के विश्वनाथ दास, दिलीप गांगुली, पुलोक राय इत्यादि ने बताया कि सेनरेले साइकिल कारखाना में लोहा, तांबा व पीतल की सारी मशीनें गायब हो गई। लोगों ने कहा कि कारखाना के मालिकों को इस बात की जानकारी थी लेकिन राजनीति से दुखी उनलोगों ने नुकसान को झेलने के बावजूद कारखाने की सुध फिर कभी नहीं ली कि वह साबूत बचा है या नहीं। लोगों ने बताया कि कारखाने की ईंट काफी कीमती थी जिसकी आज के बाजार में प्रति ईंट 20 रुपये होगी। लोगों ने कहा कि चोर बंद कारखाना का सारा समान चोरी कर ले गए मगर हमारे देश की पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के स्टैच्यू को नहीं ले गये। चोर व माफियाओं ने कम से कम इंदिरा गांधी का सम्मान तो रखा।

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