भारतीय हॉकी का एक सुनहरा अध्याय समाप्त

नयी दिल्ली : भारत की 1980 के मॉस्को ओलंपिक में आखिरी बार हॉकी स्वर्ण पदक जीतने वाली टीम के सदस्य और ड्रिब्लिंग के जादूकर कहे जाने वाले मोहम्मद शाहिद का गुड़गांव के एक अस्पताल में बुधवार सुबह निधन हो गया। शाहिद 56 वर्ष के थे और पिछले कुछ समय से लीवर की बीमारी से जूझ रहे थे। केंद्रीय खेल मंत्री विजय गोयल और हॉकी इंडिया के अध्यक्ष नरेंद्र ध्रुव बत्रा ने शाहिद के निधन पर गहरा शोक व्यक्त किया है। शाहिद के निधन से खेल जगत में शोक की लहर दौड़ गई है। शाहिद के गुड़गांव के अस्पताल में भर्ती होने के बाद से ही उनके प्रशंसक उनके जल्द स्वस्थ होने की प्रार्थनाएं और दुआएं कर रहे थे लेकिन बुधवार सुबह उनके निधन के साथ ही जैसे पूरा खेल जगत खामोश हो गया। शाहिद के निधन से भारतीय हॉकी का एक सुनहरा अध्याय भी समाप्त हो गया है। दुनिया के बेहतरीन फारवर्डों में शुमार और ड्रिब्लिंग के बेताज बादशाह माने जाने वाले शाहिद 1980 के मॉस्को ओलंपिक में आखिरी बार ओलंपिक स्वर्ण जीतने वाली हॉकी टीम के सदस्य थे। वह दो बार एशियाई खेलों 1982 और 1986 में पदक जीतने वाली भारतीय टीम के भी सदस्य थे। उत्तर प्रदेश के वाराणसी में जन्मे शाहिद को 1980 की चैंपियंस ट्राफी में सर्वश्रेष्ठ फारवर्ड चुना गया था और वह 1986 में ऑल स्टार एशियन टीम के सदस्य चुने गये थे। उन्हें 1980-81 में अर्जुन पुरस्कार तथा 1986 में पद्मश्री से सम्मानित किया गया था। 14 अप्रैल 1960 को वाराणसी में जन्मे शाहिद ने बुधवार सुबह गुड़गांव के एक निजी अस्पताल में करीब 10 बजकर 45 मिनट पर अंतिम सांस ली। उन्हें उपचार के लिये वाराणसी से इस अस्पताल लाया गया था और रेलवे तथा सरकार ने उनके इलाज के लिये मदद दी थी। लेकिन उनकी सेहत बराबर गिरती चली गई जिसके बाद उन्हें वेंटीलेटर पर रखा गया था। शाहिद के पार्थिव शरीर को वापिस उनके गृहनगर वाराणसी ले जाया जाएगा जहां उनका अंतिम संस्कार किया जाएगा। शाहिद को पेट दर्द की शिकायत के बाद जून के आखिर में बनारस हिंदू विश्वविद्यालय स्थित एसएसएल अस्पताल में भर्ती कराया गया था लेकिन उनकी हालत बिगड़ती देख दिल्ली लाया गया और उन्हें गुड़गांव के मेदांता अस्पताल में भर्ती कराया गया जहां तीन सप्ताह बाद उनका निधन हो गया। उनके परिवार में पत्नी परवीन शाहिद और दो बच्चे मोहम्मद सैफ और हीना शाहिद हैं। रेलवे में खेल अधिकारी के रूप में कार्यरत शाहिद के इलाज के लिये रेलवे और केंद्रीय खेल मंत्रालय ने आर्थिक मदद दी थी। शाहिद से रियो में देश का प्रतिनिधित्व करने जा रही भारतीय हॉकी टीम और खेल मंत्री विजय गोयल ने भी हाल ही में मुलाकात की थी। वर्ष 1980 के मॉस्को ओलंपिक में स्वर्ण पदक और 1982 तथा 1986 के एशियाई खेलों में पदक दिलाने वाले शाहिद का जन्म 14 अप्रैल 1960 को उत्तर प्रदेश के वाराणसी में हुआ था। उन्होंने मात्र 19 वर्ष की आयु में ही 1979 में अंतरराष्ट्रीय हॉकी में अपना पदार्पण कर लिया था। वह पहली बार जूनियर विश्वकप में फ्रांस के खिलाफ उतरे थे और उन्होंने अपनी प्रतिभा को उसी समय साबित कर दिया था। शाहिद ने इसके बाद मलेशिया में चार राष्ट्रों के टूर्नामेंट के दौरान वाहवाही बटोरी। देश के बेहतरीन ड्रिब्लर शाहिद अपनी इसी प्रतिभा के दम पर वर्ष 1980 की ओलंपिक टीम का हिस्सा बने और भारत को ओलंपिक हॉकी में आखिरी स्वर्ण पदक दिलाया। उनके इस प्रदर्शन के लिये वर्ष 1980-81 में अर्जुन अवार्ड और फिर 1986 में पद्मश्री से नवाजा गया। इस दिग्गज खिलाड़ी का खेल तेज गति और अपनी शानदार ड्रिब्लिंग से विपक्षी डिफेंडरों को छकाने के लिये जाना जाता था। शाहिद अपनी जगह खड़े खड़े तीन चार डिफेंडरों को चकमा देने के लिये मशहूर थे। उनके इसी खेल के लाखों प्रशंसक हुये और उन्हें ड्रिब्लिंग के जादूगर का खिताब मिला। शाहिद ने 1985-86 के सत्र में भारत की कप्तानी भी की थी। खेल से संन्यास के बाद शाहिद रेलवे में कार्यरत थे और अपने गृह नगर वाराणसी में रह रहे थे। शाहिद और जफर इकबाल की जोड़ी को दुनिया में सर्वश्रेष्ठ माना जाता था। इन दोनों का तालमेल विपक्षी टीमों में दहशत पैदा करता था। खासतौर पर एशियाई खेलों के दौरान दोनों खिलाड़ियों का प्रदर्शन काबिलेतारीफ रहा था। शाहिद से कुछ दिन पहले अस्पताल मिलने पहुंचे जफर अपने जोड़ीदार के निधन पर स्तब्ध हैं। जफर ने शाहिद के निधन पर गहरा शोक व्यक्त करते हुये कहा कि यह मेरे लिये सबसे बड़े दुख की घड़ी है। वह मेरे सबसे करीबी टीम साथी थे और हम मिलकर कई वर्ष साथ खेले थे। शाहिद के पूर्व ओलंपिक टीम साथी एमएम सौमाया ने भी भरे हुये शब्दों में कहा कि मेरे लिये यह यकीन करना मुश्किल है कि शाहिद अब नहीं रहे। अस्सी के दशक में उनके खेल के लाखों दीवाने थे। उनके खेल को देखना ही बड़े सौभाग्य की बात थी। शाहिद और जफर की जोड़ी कमाल की थी। जफर की गजब की तेजी और शाहिद की ड्रिब्लिंग ने भारतीय हॉकी को नयी ऊंचाइयां दी थीं। भारतीय टीम का रियो ओलंपिक में नेतृत्व करने जा रहे गोलकीपर पी आर श्रीजेश, राष्ट्रीय बैडमिंटन टीम के कोच पुलेला गोपीचंद और देश के खिलाड़ियों ने हॉकी के इस जादूगर के निधन पर गहरा दुख व्यक्त किया है। गोपीचंद ने कहा कि मुझे यह खबर सुनकर गहरा झटका लगा है। यह हमारे लिये ही नहीं बल्कि पूरे खेल जगत के लिये बड़ी क्षति है। शाहिद हॉकी के बेहतरीन खिलाड़ियों में से एक थे और उन्होंने अपने खेल से देश को गौरवान्वित किया था। श्रीजेश ने कहा कि मेरे पास तो शब्द ही नहीं है। हमने हाल ही में उनसे मुलाकात की थी और उस समय उनकी हालत बहुत गंभीर थी। भारतीय हॉकी के लिये यह बहुत बड़ी क्षति है।

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