बीसीसीआई के नये संविधान को मंजूरी, सुप्रीम कोर्ट ने एक राज्य-एक वोट की नीति में किया संशोधन

‘कूलिंग’ अवधि की सिफारिश खारिज
नयी दिल्ली : उच्चतम न्यायालय ने भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) और राज्य क्रिकेट संघों को बड़ी राहत देते हुये गुरुवार को ‘एक राज्य एक मत’ और पदाधिकारियों के लिये ‘कूलिंग’ अवधि की सिफारिश को खारिज करते हुये भारतीय क्रिकेट बोर्ड के नये संविधान को मंजूरी दे दी। उच्चतम न्यायालय ने बीसीसीआई में संवैधानिक और आधारभूत सुधारों के लिये लोढा समिति की नियुक्ति की थी जिसने क्रिकेट में सुधार के लिए कई सिफारिशे की थी जिसका अधिकतर राज्य संघों ने पुरजोर विरोध किया था। यदि ये सिफारिशें लागू हो जातीं तो देश के क्रिकेट प्रशासन में क्रांतिकारी परिवर्तन आ जाता। इन सुधारों को लागू करने के लिये उच्चतम न्यायालय ने प्रशासकों की समिति गठित की थी जिसने बीसीसीआई के नये संविधान का मसौदा तैयार किया था। लेकिन सर्वोच्च अदालत ने दो महत्वपूर्ण सिफारिशों को दरकिनार कर दिया। प्रशासकों की समिति (सीओए) के अध्यक्ष विनोद राय ने इस फैसले का स्वागत किया है।
मुंबई, सौराष्ट्र, वडोदरा और विदर्भ को मिली स्थायी सदस्यता
मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने बोर्ड के लिये तैयार किये गये संविधान के मसौदे को कुछ बदलावों के साथ मंजूरी दे दी। अदालत ने साथ ही बीसीसीआई के राज्य सदस्यों को बड़ी राहत देते हुये प्रति राज्य एक वोट की सिफारिश को रद्द कर दिया है और मुंबई, सौराष्ट्र, वडोदरा, गुजरात, विदर्भ, महाराष्ट्र क्रिकेट संघों को स्थायी सदस्यता प्रदान कर दी है। लोढा समिति ने अपनी सिफारिशों में इन क्रिकेट संघों को अपने अपने राज्यों में रोटेशन के आधार पर चलाने की सिफारिश की थी। मुख्य न्यायाधीश ने तमिलनाडु सोसायटी के रजिस्ट्रार जनरल को चार सप्ताह के भीतर नये संशोधित बीसीसीआई संविधान मसौदे को रिकार्ड करने के लिये निर्देश भी दिये हैं। खंडपीठ में न्यायमूर्ति ए एम खानविलकर और डीवाई चंद्रचूण भी शामिल थे।
रेलवे, सेना व यूनिवर्सिटीज की सदस्यता बरकरार
लोढा समिति ने रेलवे स्पोर्टस प्रमोशन बोर्ड, सर्विसेज स्पोर्टस काउंसिल बोर्ड, इंडियन यूनिवर्सिटीज, नेशनल क्रिकेट क्लब कोलकाता और क्रिकेट क्लब ऑफ इंडिया की पूर्ण सदस्यता रद्द करने की सिफारिश की थी लेकिन खंडपीठ ने रेलवे, सेना और यूनिवर्सिटीज की स्थायी सदस्यता को भी बरकरार रखा है। सर्वोच्च अदालत ने बीसीसीआई के पदाधिकारियों के लिये दो कार्यकालों के बीच में अंतर की समयावधि के नियम में भी बदलाव किये हैं। संशोधित नियम के अनुसार बोर्ड का कोई शीर्ष पदाधिकारी अब एक के बजाय लगातार दो कार्यकाल यानि छह वर्षों तक पद पर बना रह सकता है। वह बीसीसीआई या राज्य अथवा दोनों को मिलाकर तीन तीन साल का दो कार्यकाल गुजार सकता है।
30 दिन के भीतर नये नियम लागू करने के आदेश
अदालत ने साथ ही क्रिकेट संघों को आदेश दिये हैं कि वे 30 दिनों के भीतर बीसीसीआई के संविधान को लागू करें। इसके लिये अदालत ने सीओए को भी निर्देश दिये हैं कि वह इस प्रक्रिया की निगरानी करे। राज्य संघों को नियम उल्लंघन करने की स्थिति में सजा के लिये भी चेताया गया है। उल्लेखनीय है कि पांच जुलाई को अपने फैसले में सभी राज्य क्रिकेट संघों को शीर्ष अदालत ने अगले आदेश तक चुनाव कराने से रोक लगायी थी।
सर्वोच्च अदालत ने इससे पहले बीसीसीआई के पदाधिकारियों और राज्य क्रिकेट संघों को भारतीय बोर्ड के नये संविधान के लिये अपनी सलाह देने के लिये भी कहा था जो लोढा समिति की सिफारिशों की दिशा में हों। लोढा समिति ने बीसीसीआई में आधारभूत ढांचें में बदलाव के लिये अपनी सिफारिशें अदालत के सामने रखी थीं। उल्लेखनीय है कि न्यायाधीश मुकुल मुद्गल समिति की रिपोर्ट ने बीसीसीआई में ढांचागत बदलावों की सिफारिश की थी जिसके लिये लोढा समिति का जनवरी 2015 में गठन किया गया था। मुद्गल समिति वर्ष 2013 में दुनिया की सबसे बड़ी ट्वंटी 20 घरेलू क्रिकेट लीग आईपीएल में स्पॉट फिक्‍सिंग और सट्टेबाजी की जांच से जुड़ी थी। शीर्ष अदालत ने 18 जुलाई 2016 को लोढा समिति की सिफारिशों को स्वीकार किया था। पूर्व नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) विनोद राय की अध्यक्षता वाली सीओए को अब इन सिफारिशों को लागू कराने का जिम्मा सौंपा गया है जो निर्देशों के लिये फिर से अदालत से संपर्क कर सकती है।

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