सम्पादकीय : खतरनाक दोपहरी और लापरवाह ड्राइवर

हिंदू लोकाचार में कहा गया है कि सूरज जब मध्य आकाश से नीचे की ओर ढलने लगे तो यात्राएं रोक देनी चाहिए। न जाने समय और स्थितियों के किन दबाव के तहत यह कहा गया था पर देश में आधुनिक काल में यह उक्ति सच होती हुई मालूम पड़ रही है। सन् 2016 के सरकारी आंकड़े बताते हैं कि भारतीय सड़कों पर हुई कुल 4 लाख 80 हजार 652 सड़क दुर्घटनाओं में से 85 हजार 834 यानी 18 प्रतिशत दुर्घटनाएं दोपहर 3 बजे से 6 बजे के बीच हुईं। सड़क परिवहन एवं हाईवे मंत्रालय की अगस्त 2017 में जारी रिपोर्ट के मुताबिक सन् 2005-16 के बीच देश में कुल सड़क दुर्घटनाओं में 15 लाख 55 हजार 98 लोग मारे गए। यह संख्या बहरीन की आबादी से ज्यादा है। सन् 2016 के आंकड़े बताते हैं कि देश में हर घंटे 55 सड़क दुर्घटनाएं दर्ज की गयीं। इन दुर्घटनाओं में 1 लाख 50 हजार 786 लोग मारे गए यानी प्रति घंटे 17 आदमी या कहें हर 3 मिनट पर एक आदमी सड़क पर दौड़ती मौत के मुंह में समा गया। इस अवधि में घायल होने वालों की संख्या 4 लाख 94 हजार 624 है। सबसे बड़ी ट्रेजेडी है कि मरने वालों में 25 प्रतिशत लोग 25 वर्ष से 35 वर्ष की आयु वर्ग के थे। इसके बाद सबसे ज्यादा दुर्घटनाएं शाम 6 बजे से 9 बजे तक हुईं। सन् 2016 में इस अवधि में 84 हजार 555 एक्सीडेन्ट्स हुए। भारत में सबसे ज्यादा एक्सीडेन्ट्स दोपहर बाद 3 बजे से रात 9 बजे तक हुए। सन् 2016 में इस दौरान कुल 35% एक्सीडेन्ट्स हुए। इन दुर्घटनाओं में 4 लाख 3 हजार 598 या 85% एक्सीडेन्ट्स चालक की गलती से हुए। इनमें 1 लाख 21 हजार 216 लोग मारे गए। ड्राइवर की गलती में सबसे ज्यादा हाथ तेज रफ्तार से गाड़ी चालने का है। ड्राइवर की गलती से जितने एक्सीडेन्ट्स हुए उनमें 66 प्रतिशत घटनाएं तेज रफ्तार के कारण हुईं। इनमें 73 हजार 896 लोग मरे। इनमें आगे जाने की होड़ के कारण 7.3 प्रतिशत और गलत साइड में गाड़ी चलाने के कारण 4.4 प्रतिशत एक्सीडेन्ट्स हुए, जिनमें 1 लाख 21 हजार 126 लोगों में से क्रमशः 7.8 प्रतिशत और 4.7 % लोग मारे गये। शराब पीकर गाड़ी चलाने के कारण 14 हजार 894 दुर्घटनाओं में 6 हजार 131 लोग मारे गए यानी शराब पीकर या किसी और नशे के प्रभाव में आकर वाहन चलाने से रोज 17 लोग मारे जाते हैं। गाड़ी चलाते वक्त मोबाइल फोन का उपयोग करने से 4 हजार 976 घटनाएं हुईं, जिनमें 2 हजार 138 लोग मारे गए। दूसरे शब्दों में रोजाना 14 एक्सीडेन्ट्स हुए, जिनमें 6 लोग मारे गए। सन् 2016 में दोपहिया वाहनों की 1 लाख 62 हजार 280 दुर्घटनाएं हुईं, जिनमें 1 लाख 13 हजार 167 दुर्घटनाएं कार, जीप और टैक्सी से हुईं बाकी ट्रकों, टेम्पो और ट्रैक्टर्स से हुईं। इन एक्सीडेन्ट्स में 28 लोग हर रोज मारे गए। लेकिन इस समस्या के पीछे खतरनाक ड्राइविंग और कमजोर कानून ही एकमात्र वजह नहीं है। शहरों में वाहनों की संख्या में बहुत तेजी से इजाफा हो रहा है। आंकड़ों के अनुसार मुंबई में अव्यवस्थित ट्रैफिक में हर 10 सेकेंड में एक नयी गाड़ी जुड़ जाती है। इस तरह से यहां हर रोज करीब 9 हजार नए वाहन सड़क पर आते हैं। इससे यहां की सड़कें बुरी तरह से जाम हो चुकी हैं। यहां दो गाड़ियों के बीच सुरक्षित दूरी बनाकर रखना एक तरह से असंभव हो गया है।
सरकार का लक्ष्य अगले दो सालों में सड़क हादसों में हताहतों की संख्या 50 प्रतिशत कम करना है। पुलिस के आंकड़ों पर आधारित रिपोर्ट के मुताबिक, सड़क हादसों (84 प्रतिशत), मौत (80.3 प्रतिशत) और घायल (83.9 प्रतिशत) के लिए सबसे अधिक जिम्मेदार एकमात्र कारण चालकों की लापरवाही है। इस रिपोर्ट में बताया गया है कि 13 राज्यों में 86 प्रतिशत हादसे होते हैं। ये राज्य तमिलनाडु, मध्य प्रदेश, कर्नाटक, उत्तर प्रदेश, आंध्र प्रदेश, गुजरात, तेलंगाना, छत्तीसगढ़, पश्चिम बंगाल, हरियाणा, केरल, राजस्थान और महाराष्ट्र है।

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