कांग्रेस के आत्मघाती चेहरे

लेखक- विष्णुगुप्त

कांग्रेस में इन दिनों एक के बाद एक कई आत्मघाती चेहरे सामने आ रहे हैं, जो समय-समय पर कांग्रेस की साख, विश्वसनीयता और उसके अस्तित्व को ग्रहण लगा रहे हैं। उसे दीमक की तरह चाट रहे हैं। ये चेहरे बयानबाज हैं और अपने बयानबाजी से न केवल अति विवाद खड़ा करते हैं बल्कि खुद की और कांग्रेस की जगहंसाई कराते हैं। कभी-कभी तो ये सभी नैतिक सीमाओं को पार कर गाली-गलौज की भाषा तक उतर जाते हैं। सिर्फ इतना ही नहीं बल्कि दुश्मन देश पाकिस्तान में बैठकर अपने देश की सरकार और उसके प्रमुख पर अश्लील और नुकसानदेह बयानबाजी करते हैं, लेकिन ऐसे आत्मघाती बयानों से कांग्रेस अपना पीछा नहीं छुड़ाना चाहती है। जब कांग्रेस के नेतृत्व से ही ऐसी आत्मघाती बयानबाजी, आत्मघाती चेहरे से कोई लगाम की उम्मीद नहीं बनती है तो फिर यह सुनिश्चित कैसे होगा कि कांग्रेस के बयानबाज और आत्मघाती चेहरे अपनी बयानबाजी और राजनीति में नैतिकता और शुचिता को स्थापित कर देश की राजनीति में रचनात्मक विरोध का रास्ता अपनायेंगे? कांग्रेस के अंदर पहले चमचागीरी करने वाले चेहरे तो हुआ करते थे पर आत्मघाती चेहरे नहीं होते थे। नेहरू से लेकर राजीव गांधी तक ऐसी स्थिति थी। इंदिरा गांधी और राजीव गांधी के पक्ष में एक के बाद एक चमचागीरी करने वाले कई चेहरे जरूर थे पर वे ऐसी कोई बयानबाजी नहीं करते थे, जिससे कांग्रेस का ही नुकसान हो और कांग्रेस की जगहंसाई हो तथा जनांकाक्षा कांग्रेस के खिलाफ हो जाये। लेकिन जैसे ही कांग्रेस में सोनिया गांधी-राहुल गांधी का नेतृत्व आया, वैसे ही कांग्रेसी बेलगाम हो गये, अहंकारी हो गये। खुद राहुल गांधी अमरीका में स्वीकार कर चुके हैं कि कांग्रेस अहंकारी हो गयी थी। कांग्र्रेस के नेताओं को यह अहंकार हो गया था कि वे जो कहेंगे, चाहे वह बात राजनीतिक तौर पर अस्वीकार करने वाली ही होगी, जनता स्वीकार कर ही लेगी और उसका कोई दुष्परिणाम नहीं निकलेगा। जाहिर तौर पर कांग्रेस सत्ता से दूर हो गयी। सत्ता से दूर होने के बावजूद कांग्रेस अहंकार से मुक्त नहीं हुई है। कांग्रेसी नेताओं की गाली-गलौज वाली भाषा बंद नहीं हुई है। अतिवादिता उन पर हावी है। यही कारण है कि कांग्रेस हार पर हार झेल रही है, फिर भी उसका जगहंसाई और आत्मघात करने वाले प्रश्नों से पीछा नहीं छूट रहा है।
अभी-अभी दो गाली-गलौज वाली कांग्रेस की राजनीतिक प्रवृत्तियां जनचर्चा में हैं और ये दोनों गाली-गलौज वाली कांग्रेसी राजनीतिक प्रवृत्तियों ने कांग्रेस की जड़ों को न केवल कमजोर किया है बल्कि कांग्रेस की जमकर जगहंसाई करायी है। जब ये कांग्रेसी राजनीतिक प्रवृत्तियां जन कसौटी पर परख कर कांग्रेस के लिए नुकसानजनक रूप में सामने आयीं तो फिर माफी जैसे शब्द से नुकसान की भरपाई करने की चाल भी सामने आयी। पर नुकसान तो कांग्रेस का हो चुका था। सबसे पहले मनीष तिवारी की गाली-गलौज वाली ट्वीट की चर्चा आपके सामने है। मनीष तिवारी की ट्वीट पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ गाली-गलौज की भाषा में एक टिप्पणी आयी। टिप्पणी लिखने के समय मनीष तिवारी को यह अहसास नहीं होगा कि उसका प्रतिफल इतना कठोर और नुकसानदेह होगा और कांग्रेस की मजबूत जड़ों पर प्रश्नचिह्न लग जायेगा। मनीष तिवारी की गाली-गलौज वाली टिप्पणी जैसे ही ट्वीट पर वायरल हुई, वैसे ही आभासी दुनिया में तूफान आ गया। भाजपा और नरेंद्र मोदी की टीम से जवाब आने के पूर्व आभासी दुनिया ने कांग्रेस की जड़ों की खुदाई करनी शुरू कर दी, ऐसे-ऐसे जवाब दिये गये, जिससे कांग्रेस की खूब जगहंसाई हुई, कांग्रेस के खिलाफ जनाक्रोश भी पनपा। बात यह स्थापित हुई कि क्या यह कांग्रेस गांधी-नेहरू और तिलक जैसे महापुरुषों की है, जो अपने विरोधियों से भी प्यार करते थे और उन्हें सम्मान देते थे, क्या मनीष तिवारी जैसे लोगों की कांग्रेस में जगह होनी चाहिए? बात सिर्फ इतनी भर नहीं है बल्कि कम्युनिस्टों को भी मनीष तिवारी की गाली-गलौज की भाषा स्वीकार नहीं हुई। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के नेता डी. राजा ने विरोध जताते हुए कहा कि हमारी विचारधारा अलग है पर नरेंद्र मोदी इस देश के प्रघानमंत्री हैं, इसलिए मनीष तिवारी और कांग्रेस को विरोध के लिए संयमित भाषा का प्रयोग करना चाहिए।
प्रधानमंत्री मोदी के खिलाफ गाली-गलौज का दूसरा प्रकरण दिग्विजय सिंह के साथ जुड़ा हुआ है। दिग्विजय सिंह ने एक ऐसे झूठे ट्वीट को आधार बनाकर प्रधानमंत्री मोदी को गाली देने का काम किया था। दिग्विजय की राजनीतिक भाषा कैसी है और दिग्विजय लगातार नाकामयाबियां झेलते-झेलते कितने गुस्सैल हो गये हैं, उनका गुस्सा भाजपा और नरेंद्र मोदी के खिलाफ किस प्रकार से फूटा था, यह भी जगजाहिर है। अपनी गाली गलौज वाली टिप्पणी का मोहरा दिग्विजय सिंह ने रवीश कुमार को बनाया था। जब मीडिया और आभासी दुनिया में तूफान उठा तब रवीश कुमार को जवाब देने के लिए बाध्य होना पड़ा कि जिस ट्वीट पर दिग्विजय सिंह ने गाली-गलौज की भाषा लिखी है, वह ट्वीट उनका है ही नहीं। रवीश कुमार के स्पष्टीकरण के बाद दिग्विजय सिंह की असलियत खुल चुकी थी। दिग्विजय सिंह की गाली-गलौज वाली भाषा ने कांग्रेस के खिलाफ जनमत तैयार कर दिया था।
कांग्रेस के नेता और पूर्व मंत्री मणिशंकर अय्यर ने पाकिस्तान में नरेंद्र मोदी की तुलना संहारक और नकारात्मक राजनीति से की थी, सिर्फ इतना ही नहीं बल्कि अय्यर ने नरेंद्र मोदी को हटाने के लिए पाकिस्तान से सहयोग भी मांगा था। यही अय्यर हैं, जिन्होंने कहा था कि क्या एक चाय बेचने वाला प्रधानमंत्री बनेगा, नरेंद्र मोदी कभी भी प्रधानमंत्री नहीं बनेंगे? अय्यर के जवाब में यह कहा गया था कि जब हवाई जहाज का ड्राइवर राजीव गांधी प्रधानमंत्री बन सकता है तो फिर एक चाय बेचने वाले मोदी क्यों नहीं प्रधानमंत्री बनेंगे? परिणाम भी अय्यर के खिलाफ आया। मोदी प्रधानमंत्री बन गये। अय्यर आज भी मोदी के खिलाफ कोई न कोई अस्वीकार्य योग्य बयानबाजी करते ही रहे हैं। कांग्रेस के अंदर अभी दो नेता अति सक्रिय हैं। एक पी चिदंबरम और दूसरा सुशील कुमार शिंदे। जब कांग्रेस नेतृत्व वाली संप्रग सरकार थी, तब इन दोनों नेताओं ने दुष्परिणामों की चिंता किये बिना हिंदू आतंकवाद की थ्योरी दी थी। इन लोगों ने सोचा था कि हिंदू आतंकवाद को प्रत्यारोपित करने से भाजपा और संघ जमींदोज हो जायेंगे। हुआ उल्टा। हिंदू आतंकवाद के प्रत्यारोपण के खिलाफ सक्रिय होकर भाजपा और संघ ने कांग्रेस को सत्ता से बाहर कर दिया। कांग्रेस यह स्वीकार कर चुकी है कि हिंदुओं के विरोध के कारण ही उनकी सत्ता गयी और मोदी प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुंचे हैं।
वंशवाद की थ्योरी भी कांग्रेस के लिए असहज और नुकसानदेह है। राहुल गांधी ने अमरीका में कहा कि वंशवाद देश को पीछे धकेल रहा है। हर जगह वंशवाद पनपा हुआ है। आधुनिक भारतीय राजनीति में वंशवाद का जन्मदाता कौन है? वंशवाद के जन्मदाता तो राहुल गांधी के खानदान के पुरोधा पंडित जवाहर लाल नेहरू ही हैं। खुद राहुल गांधी वंशवाद की उपज हैं। अगर वे नेहरू खानदान के नहीं होते तो फिर उनको देश में कौन पूछता? राहुल गांधी ने भी हिंदुओं को अपमानित करने वाली भाषा बोलकर अमरीकी प्रतिनिधि से कहा था कि हमारे देश को हिंदू आतंकवाद से खतरा है। अभी चीन के साथ जब तनातनी चल रही थी और युद्ध जैसी स्थिति थी तब राहुल गांधी चीन के राजदूत से मिलने चले गये थे। राहुल गांधी के इस कदम को देश की जनता ने अस्वीकार कर दिया था। अतिवाद और अति विरोध से बचना चाहिए, पर कांग्रेस नरेंद्र मोदी के खिलाफ अतिवाद और अति विरोध की शिकार हो जाती है, जैसे बुलेट ट्रेन का विषय। जापानी सहयोग से आने वाली बुलेट ट्रेन की परियोजना को कांग्रेस ने अति विरोध की परिधि में खड़ा कर दिया। कांग्रेस का कहना था कि बुलेट ट्रेन की परियोजना गरीब विरोधी है। पहले देश की रेलगाड़ियों को सुधारो और जर्जर रेल पटरियों को बदलो। जनता का प्रश्न यह है कि कांग्रेस ने 70 सालों में रेल पटरियां क्यों नहीं बदली और अब कांग्रेस के विरोध की जरूरत क्या है? कई ऐसे प्रश्न हैं, जिसमें कांग्रेस मोदी के विरोध में अतिवाद का शिकार हो गयी है। कांग्रेस को ऐसे प्रश्नों से बचना होगा और नुकसानदेह आत्मघाती चेहरों का अस्वीकार करना होगा तभी कांग्रेस को अपनी विश्वनीयता वापस लेने का अधिकार हासिल होगा। वरिष्ठ पत्रकार

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