50 वर्षों की लड़ाई के बाद पहली बार बने विधायक मधुसूदन घोष

‘हिंदी भाषियों के प्रति नीतियां बनाकर ही उनका विकास संभव’ 1964 से बंगाल में कांग्रेस से जुड़़करindex-1 अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत करने वाले मधुसूदन घोष 50 वर्षों के लड़ाई के बाद पहली बार विधायक बने हैं। इस दौरान वे कभी पंचायत सदस्य बनें तो कभी उन्होंने गारुलिया नगरपालिका में अपने वार्ड के लोगों का दिल जीतकर पार्षद पद पर उनके हित के लिए काम किया। एक बार वे गारुलिया नगरपालिका के चेयरमैन भी नियुक्त हुए। 65 की उम्र पार कर चुके कांग्रेस नेता ने जहां इस बार चुनाव लड़ने के प्रति पहले तो उदासीनता बनायी रखी थी वहीं गठबंधन के तहत कांग्रेस से चुनाव लड़ने की जिम्मेदारी दिये जाने पर वे इस बार भी अपनी जिम्मेदारियों से चूके नहीं और उन्होंने अपनी ओर से ऐड़ी चोटी का बल लगा दिया। उनके परिश्रम का फल भी उन्हें मिला और नोआपाड़ा के लोगों ने उन्हें अपना विधायक चुना। कांग्रेस विधायक मधुसुदन घोष से सन्मार्ग ने कई विषयों पर बातचीत की, पेश है उनसे बातचीत के अंश-
सन्मार्ग : जीतने की कितनी उम्मीद थी ?
मधुसूदन घोष : उम्मीद तो थी, क्योंकि लोग यहां पूर्व तृणमूल विधायक के कार्य न करने से नाखुश थे। उन्हें काम की उम्मीद थी और लोगों ने यहां मुझे पहले काम करते हुए देखा है। यही कारण है कि मेरी जीत हुई।
सन्मार्ग : सरकार तृणमूल की, कितना मुश्किल है काम करना ?
मधुसूदन घोष : विधायक को बराबर ही फंड मिलेंगे चाहे वह विधायक तृणमूल का हो या किसी और दल का। अब रही बात काम करने की तो मैं अपने फंड से ग्रामीण इलाकों में काम करने पर विशेष जोर दूंगा क्योंकि वहां के लोग अभी भी बहुत तकलीफ में हैं। रास्ता-घाट, स्वास्थ्य केंद्र, पेय जल की समस्याएं तुलनात्मक तरीके से वहां अधिक है। मैं मिलने वाले विधायक फंड का अपनी स्तर पर उपयोग कर काम करूंगा और उम्मीद करता हूं कि जनहित में राज्य सरकार मेरी मदद करेगी।
सन्मार्ग : आपके विचार से गठबंधन का यहां क्या भविष्य है ?
मधुसूदन घोष : यह गठबंधन ही दोनों दलों को भविष्य तय करेगी अतः जरूरी है कि जनता की यह जोट बना रहे और दोनों दल के नेता व कर्मी एकजुट होकर काम करे। मेरा विचार है कि अभी न तो माकपा और ना ही कांग्रेस ही बंगाल में अकेले दम भरने के काबिल है। दोनों को नीतियां बनाकर संगठन को मजबूत बनाना है ताकि आगे मुकाबला टक्कर का हो।
सन्मार्ग : गारुलिया में हिंदीभाषियों की संख्या अधिक है उनके विकास की क्या योजना है?
मधुसूदन घोष : मुझे लगता है कि जिन नगरपालिकाओं में हिंदीभाषी आबादी 40 प्रतिशत तक व उससे अधिक है वहां उनके प्रति अलग से नीतियों पर काम किया जाना चाहिए। गारुलिया में ज्यादातर हिंदीभाषी बस्ती इलाकों में निवास करते हैं। उन्हें रहने और शौचालयों की भारी समस्या झेलनी पड़ती है अतः उनके विकास के लिए नगरपालिका को अलग से सोचना होगा। मैं अपने स्तर पर बस्तियों में होने वाली इन समस्याओं को दूर करने पर प्राथमिकता रखूंगा।
सन्मार्ग : नोआपाड़ा में गंगा किनारे धंसान की समस्या के लिए क्या कदम उठाएंगे?
मधुसूदन घोष : यह एक बड़ी समस्या है जिसके निदान के लिए काफी फंड की जरूरत है। मेरी कोशिश है कि मैं केंद्र से इसके लिए फंड का जुगाड़ करूं, इसके लिए अस्थायी उपाय करना पैसों की बरबादी है अतः स्थायी कदम ही उठाना पड़ेगा।

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