ममता ने बांग्लादेशी नागरिक को भारतीय नागरिक बताया, दे रही संरक्षण-भाजपा

कोलकाता : असम में नेशनल सिटीजन रजिस्ट्रेशन (एनआरसी) के मुद्दे पर असम के बाद बंगाल में राजनीतिक घमासान तेज हो गया है। एनआरसी को लेकर ममता बनर्जी केन्द्र सरकार पर हमला बोला और कहा कि बीजेपी देश बांटो और राज करो की नीति अपना रही है। उन्होंने कहा वे लोग लोगों को बांटने की कोशिश कर रहे हैं। देश में रक्तपात और गृह युद्ध होगा। ममता बनर्जी ने कहा कि कल को 40 लाख से ज्यादा लोगों ने सत्ताधारी पार्टी को वोट दिया और आज अचानक इन्हें अपने ही देश में रिफ्यूजी बना दिया गया है।
ममता ने कहा सब भारत के नागरिक
ममता बनर्जी ने कहा कि सिर्फ चुनाव जीतने के लिए ही लोगों पर अत्याचार नहीं किया जा सकता है। उन्होंने कहा क्या आप समझते हैं जिन लोगों का नाम लिस्ट में नहीं है क्या वे अपनी पहचान का एक हिस्सा खो देंगे। कहा कि बंटवारे के पहले भारत-पाकिस्तान और बांग्लादेश एक थे, मार्च 1971 तक बांग्लादेश से जो भी लोग भारत में आए वो भारत के नागरिक हैं। ममता बनर्जी ने कहा कि यदि बंगाली कहे कि बिहारी बंगाल में नहीं रह सकते हैं, दक्षिण भारतीय कहे कि उत्तर भारतीय वहां नहीं ठहर सकते, उत्तर भारतीय कहे कि दक्षिण भारतीय यहां नहीं रह सकते, तो इस देश की हालत क्या होगी, हमलोग एक साथ हैं इसलिए ये पूरा देश परिवार है।
कांग्रेस, टीएमसी और दूसरे दलों को बांग्लादेशी घुसपैठियों पर रुख स्पष्ट करें
ममता बनर्जी के बयान पर बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने कहा कि गृह युद्ध का भय फैलाकर एक बार देश को तोड़ चुके हैं, टीएमसी इस बावत क्या कहना है, पार्टी को इस पर अपना स्टैंड स्पष्ट करना चाहिए। बीजेपी अध्यक्ष ने कहा कि एनआरसी ड्राफ्ट के खिलाफ बोलने वाली पार्टियां, जैसे कि कांग्रेस, टीएमसी और दूसरे दलों को बांग्लादेशी घुसपैठियों पर अपना रुख साफ करना चाहिए।
ममता घुसपैठियों को सरंक्षण दे रही है
बंगाल की मुख्यमंत्री व तृणमूल सुप्रीमो ममता बनर्जी द्वारा एनआरसी का विरोध किए जाने के बाद भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव व बंगाल के प्रभारी कैलाश विजयवर्गीय ने उनपर बड़ा हमला बोला है। उन्होंने एनआरसी के बहाने बांग्लादेशी घुसपैठिए का मुद्दा उठाते हुए कहा कि ममता बनर्जी को बांग्लादेशी नागरिक अपनी मौसी समझते हैं इसीलिए वे बंगाल में आ जाते हैं। भाजपा नेता ने कहा, असम में 40 लाख लोगों ने नागरिकता का प्रमाण पत्र नहीं दिया जिसके चलते एनआरसी ने उनका नाम हटा दिया गया। परंतु, ममता दीदी घुसपैठिए के बचाव में बोलकर उन्हें संरक्षण देना चाहती है। उन्होंने इशारा करते हुए कहा कि असम के बाद अब बंगाल की ही बारी है। बंगाल में भाजपा की सरकार बनने पर अवैध प्रवासियों की पहचान करने के लिए इसी तरह का कदम उठाया जाएगा। भाजपा महासचिव ने दावा किया कि अगर असम में एनआरसी के फाइनल ड्राफ्ट में 40 लाख लोग अवैध पाए गए हैं तो बंगाल में इनकी संख्या करोड़ों में होगी।
इसके साथ ही उन्होंने दावा किया कि पश्चिम बंगाल के युवा बांग्लादेश के अवैध प्रवासियों की पहचान करना चाहते हैं क्योंकि उनकी वजह से उन्हें बेरोजगारी और कानून व्यवस्था जैसी तमाम परेशानियों का सामना करना पड़ता है। भाजपा उनकी मांग का समर्थन करती है।
बता दें कि असम में एनआरसी के अंतिम ड्राफ्ट में 40 लाख लोगों को अवैध घोषित किए जाने को लेकर ममता ने भाजपा पर निशाना साधते हुए इसे वोट पॉलिटिक्स करार दिया है। उन्होंने आरोप लगाया कि सरनेम के आधार पर सूची से लोगों का नाम हटाया गया है।

 गांधी ने एजीपी से किया था समझौता 
असम में 1980 में बांग्लादेशी घुसपैठियों का मुद्दा हावी था। पाकिस्तान से अलग होकर बांग्लादेश बनने के बाद से असम में बांग्लादेशी घुसपैठियों का अवैध प्रवेश चल रहा था। घुसपैठ के मुद्दे ने राज्य की राजनीति में भी जोर पकड़ा और सिटिजनशिप रजिस्टर अपडेट करने को लेकर आंदोलन खड़ा हो गया। इसका इसका नेतृत्व अखिल असम छात्र संघ (आसू) और असम गण परिषद ने किया था। आंदोलन की आंच राष्ट्रीय राजनीति तक भी पहुंच गई और 1985 में केंद्र की तत्कालीन राजीव गांधी सरकार और आंदोलनकारियों के बीच समझौता हुआ। असम गण परिषद और अन्य आंदोलनकारी नेताओं के बीच असम समझौता हुआ। राजीव गांधी ने अवैध बांग्लादेशियों को प्रदेश से बाहर करने का आश्वासन दिया था। इस समझौते में कहा गया कि 24 मार्च 1971 तक असम में आकर बसे बांग्लादेशियों को नागरिकता दी जाएगी। इस तय समय के बाद आए बाकी लोगों को राज्य से डिपोर्ट किया जाएगा।

एनआरसी पर सुप्रीम कोर्ट ने दिया आदेश 
बाद के सालों में यह मामला लटकता चला गया। इसके बाद यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। असम पब्लिक वर्क नाम के एनजीओ सहित कई अन्य संगठनों ने 2013 में इस मुद्दे को लेकर सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दायर की थी। असम के विधानसभा चुनाव में भी बीजेपी ने इसे एक बड़ा मुद्दा बनाया था। 2015 में सुप्रीम कोर्ट के निर्देश और निगरानी में यह काम शुरू हुआ और 2018 जुलाई में फाइनल ड्राफ्ट पेश किया गया। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने, जिन 40 लाख लोगों के नाम लिस्ट में नहीं हैं, उन पर किसी तरह की सख्ती बरतने पर फिलहाल के लिए रोक लगाई है।

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