दाल-चावल खाने वाला मगरमच्छ मर गया

ग्रामीणों ने तालाब के किनारे ही मगरमच्छ का शव दफनाया, बोले- बनाएंगे मंदिर
रायपुर/बेमेतराः छत्तीसगढ़ स्‍थित बवामोहतरा नामक गांव में एक मगरमच्छ के मर जाने से आस-पास के इलाके में शोक की लहर फैल गई है। गांव के तालाब में रहने वाले ‘गंगाराम’ नाम के मगरमच्छ से लोगों का आत्मीय रिश्ता था। लोग गंगाराम को घर से लाकर दाल चावल भी खिलाते थे और वह बड़े चाव से खाता था।

सजा-धजाकर निकाली अंतिम यात्रा
गंगाराम अचानक पानी के ऊपर आ गया। जब मछुआरों ने पास जाकर देखा तो गंगाराम की सांसे थम चुकी थी। जिसके बाद पूरे गांव में मुनादी करवाई गई। गंगाराम का शव तालाब से बाहर निकाला गया। ग्रामीणों ने सजा-धजाकर ट्रैक्टर पर उसकी अंतिम यात्रा निकाली। उसे श्रद्धा सुमन अर्पित करने लोगों का तांता लग गया। दूर-दूर से लोग गंगाराम के अंतिम दर्शन के लिए पहुंचे।

कभी किसी को नहीं पहुंचाया नुकसान
आमतौर पर तालाब में मगरमच्छ आने की खबर के बाद ही लोग वहां पर जाना छोड़ देते हैं। लेकिन गंगाराम के साथ ऐसा नहीं था। उसने कभी किसी भी ग्रामीण को कोई नुकसान नहीं पहुंचाया। वहीं तालाब में नहाते समय जब लोग मगरमच्छ से टकरा जाते थे तो वह खुद ही दूर हट जाता था। तालाब में मौजूद मछलियां ही गंगाराम का आहार थी।

तालाब के किनारे हुआ पोस्टमार्टम
गंगाराम की मौत की सूचना पर वन विभाग की टीम पुलिस अमले के साथ गांव पहुंची। वन विभाग शव का पोस्टमार्टम करने के लिए ले जाने लगी। गांव वाले मगरमच्छ का पोस्टमार्टम गांव में ही करने की मांग के साथ अड़ गए। कलेक्टर ने मगरमच्छ के प्रति ग्रामीणों का लगाव देखकर अधिकारियों को गांव में ही पोस्टमार्टम करने को कहा। तालाब के किनारे ही पीएम हुआ। फिर ग्रामीणों ने ढोल-मंजीरे के साथ गंगाराम की शवयात्रा निकाली और नम आंखों से तालाब के पास ही मगरमच्छ गंगाराम को दफना दिया।

मंदिर बनवाया जाएगा
ग्रामीणों का कहना है कि गंगाराम से उनका रिश्ता कई पीढ़ियों से चला आ रहा है। गंगाराम से उनके लिए महज एक मगरमच्छ नहीं था। गंगाराम के शव को गांव में घुमाने से पहले लोगों ने उसकी पूजा भी की। अब उसकी याद में गांव में मंदिर निर्माण कराया जाएगा।

काफी विकसित था
उपवन मंडलाधिकारी बेमेतरा आरके सिन्हा ने बताया कि मगरमच्छ की लंबाई 3.40 मीटर और मोटाई 1.30 मीटर थी। उसका वजन ढाई क्विंटल था। इसकी उम्र करीब 150 साल थी। उप सरपंच भागीरथी यदु ने बताया कि तालाब के नजदीक एक महंत रहते थे। वे इस मगरमच्छ को गंगाराम कहकर पुकारते थे। उनके पुकारते ही मगरमच्छ तालाब के बाहर आ जाता था।

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