बदनामी का धब्बा मिटाने के प्रयास में सपा

अपराधियों और बदनाम नेताओं से किनारा करने का प्रयास

पार्टी नेताओं काे आशंका- कहीं उल्टा न पड़ जाए यह दाव

लखनऊः समाजवादी पार्टी! गुंडों, बाहुबलियों, भ्रष्टाचारियों और अपराधियों को खुला प्रश्रय देने वाली पार्टी के तौर पर बदनाम। यह बात पार्टी हाईकमान को भी पता है और ‘गुंडों वाली पार्टी की छवि’ से बाहर निकलने के लिए, इस कलंक को मिटाने के लिए पिता से पार्टी छीनकर राष्ट्रीय अध्यक्ष बने अखिलेश यादव ने थोड़ी कोशिश की है। यह कोशिश मतदाता को कितना लुभा पाती है, यह तो आने वाला समय ही बताएगा, लेकिन पार्टी के नेताओं को भरोसा है कि इस चुनाव में इससे फायदा जरूर मिलेगा।

हंगामा क्यों बरपा?

दरअसल, जब-जब समाजवादी पार्टी उत्तर प्रदेश में सत्ता में आई, प्रदेश में अपराधियों, बाहुबलियों और भ्रष्टाचारियों की पौ-बारह हो गई। इसी कारण समाजवादी पार्टी पर यह ठप्पा ही लग गया कि वह तो गुंडों, बाहुबलियों, भ्रष्टाचारियों और अपराधियों को खुला प्रश्रय देती है। हालांकि कोई पार्टी दूध की धुली नहीं है और टिकट वितरण की भी बात आती है तो चाहे सपा हो, बसपा हो, भाजपा हो या फिर कांग्रेस… सबकी सूची में ऐसे नाम शामिल होते हैं जिन पर दर्जनों की संख्या में आपराधिक मामले दर्ज होते हैं। लेकिन जिस तरह तरह से बलात्कार जैसे संगीन अपराधों की संख्या में 362 प्रतिशत तक इजाफा हो गया और अपहरण एवं हत्या जैसे अपराधों की संख्या डेढ़ गुना हो गई, उससे यह कलंक और गहरा ही हुअा है।

बदनामी से मुक्ति का प्रयत्न

इस बार अखिलेश ने अपनी पार्टी के प्रत्याशियों की सूची में कुछ ऐसे नाम शामिल किए हैं, जो बिल्कुल साधारण पृष्ठभूमि से आए हैं। इनको टिकट देने का एक ही मकसद है कि प्रदेश को यह संदेश दिया जाए कि समाजवादी पार्टी आम कार्यकर्ता को भी उतनी ही तवज्जो देती है, जितनी कि बड़े नेता माने जाने
वाले लोगों को। उदाहरण के तौर पर अखिलेश ने एक साइकिल की दुकान चलाने वाले के बेटे महेंद्र चौहान को टिकट दी है ताकि गरीबों को संदेश दिया जा सके कि सपा उनकी कद्र करती है। महेंद्र को जहूराबाद से टिकट दिया गया है। इसी तरह लखनऊ विश्वविद्यालय के प्रोफेसर सुधीर पंवार को इसी श्रेणी में गिना जा सकता है जिनको भाजपा के सुरेश राणा के खिलाफ पश्चिमी उत्तर प्रदेश के थाना भवन से मैदान में
उतारा गया है।

विवाद की आड़ में सफाया

सूत्रों का यह भी दावा है कि समाजवादी पार्टी के पारिवारिक विवाद की आड़ में कई ऐसे नेताओं का पार्टी से सफाया कर दिया गया जो बदनाम थे।
एक सोची-समझी रणनीति के तहत ऐसे लोगों को पहले अखिलेश के चाचा शिवपाल की सूची में शामिल किया गया और बाद में अखिलेश ने उस सूूची के अधिकांश नामों को टिकट नहीं दिया।

हार्वर्ड यूनिवर्सिटी प्रोफेसर तय कर रहा रणनीति!

अखिलेश की चुनावी रणनीति तय करने में उनके मित्र और हार्वर्ड यूनिवर्सिटी से विशेष तौर पर बुलाए गए स्टीव जॉर्डिंग की विशेष भूमिका बताई जा रही है। स्टीव को अखिलेश ने कुछ माह पहले विशेष तौर पर अपनी पार्टी का इलेक्शन वार रूम संभालने के लिए बुलाया है। अखिलेश की चुनावी टीम से जुड़े एक सूत्र ने बताया कि स्टीव की सहायता के लिए विशेष तौर पर सलाहकार अद्वैत विक्रम सिंह को लगाया गया है ताकि वे दोनों मिलकर चुनावी रणनीति को अंतिम रूप दे सकें।

तीन टीमें संभाल रहीं हैं पूरा अभियान

लगभग एक साल पहले से अखिलेश चुनावी रणनीति में जुट गए थे। तब उन्होंने तीन टीमें बनाई थीं, जिनका मुख्यालय लखनऊ को बनाया गया है। एक टीम जहां पूरी तरह से युवाओं में लोकप्रिय सोशल मीडिया साइट फेसबुक को समर्पित की गई है, वहीं दूसरी टीम को उच्च वर्ग की पहुंच वाले ट्वीटर का काम सौंपा गया है। इन दोनों टीमों का बिल्कुल उसी तर्ज पर गठन किया गया है, जिस तरह आम आदमी पार्टी ने दिल्ली में अपनी सोशल मीडिया रणनीति के तहत टीमें बनाई थीं।

तीसरी टीम के बड़े सुझाव

तीसरी टीम सबसे विस्तारित है और जमीनी स्तर पर काम रही है। यह टीम सालभर से क्षेत्र में उतरी हुई है। यह हर उस बात का पता लगा रही है जो पार्टी के पक्ष या विरोध में जा सकती है। इसी टीम ने जब जमीनी स्तर पर पता लगाया कि प्रदेश के लोगों में दो बातों को लेकर सर्वाधिक आक्रोश है- पहला समाजवादी पार्टी के बड़े नेताओं की खुली शह पर बे-लगाम हो चुके अपराधी और दूसरा- यादववाद। टीम के करीबी लोगों ने बताया कि रिपोर्ट में साफ कहा गया है कि पार्टी की सरकार आने के बाद जिस तरह से थानेदार से लेकर बड़े पदों पर यादवों की नियुक्ति और पदोन्नति हुई, उसने न केवल कानून-व्यवस्था बिगड़ाने में बड़ी भूमिका निभाई, बल्कि साथ ही लोगों का मोह अखिलेश से भंग कर दिया। इसी टीम के बताए विषयों को ध्यान में रखकर अखिलेश ने अपना चुनावी घोषणा पत्र तैयार किया है। साथ ही, इसी टीम के सुझावों पर यह रणनीति बनाई जा रही है कि किस तरह अखिलेश की छवि लोगों में मन में ऐसी बनाई जाए कि वे काम और विकास को ही प्राथमिकता देते हैं।

कई गुंडों से किया किनारा

कलंक धोने की इसी मुहिम के तहत अखिलेश ने कई बदनाम अपराधियों से किनारा भी किया है। इनमें सबसे बड़ा नाम है मुख्तार अंसारी का। इसके अलावा अतीक अहमद जैसे लोगों को भी सपा का टिकट न देकर पार्टी की छवि सुधारने का प्रयास किया जा रहा है। ऐसे और भी कई नेता हैं जिनके खिलाफ बड़ी संख्या में गंभीर आपराधिक मामले दर्ज हैं और टिकट वितरण में उनकी अनदेखी की गई है।

लेकिन कई अब भी सपाई हैं…

भले अखिलेश पार्टी की बदनामी से मुक्ति का प्रयास कर रहे हों, लेकिन अब भी राजा भैया जैसे कई नेता हैं, जिन्हें बाहुबली माना जाता है, जिनके खिलाफ मामले दर्ज हैं, जो जेल जा चुके हैं, लेकिन इसके बावजूद उन्हें इस बार फिर पार्टी के निशान पर चुनाव मैदान में उतारा गया है।

बड़ा खतरा भी..

इस बीच पार्टी के अंदरूनी लोगों को यह अंदेशा भी सता रहा है कि कहीं छवि सुधारने का यह दाव पार्टी को उल्टा न पड़ जाए। उनके अनुसार पहली बात तो यह कि जिन लोगों की पार्टी में अनदेखी की गई है, भले वे अपराधी हों, लेकिन वे प्रभावशाली भी तो हैं। ऐसे में स्पष्ट है कि वे पार्टी से चले जाएं तो ठीक है, अन्यथा वे पार्टी में रहते हैं तो उनके प्रभाव वाले क्षेत्रों से चुनाव लड़ने वालेे पार्टी प्रत्याशियों को चुनाव में भारी नुकसान पहुंचा सकते हैं। इससे पार्टी की छवि सुधरे-न सुधरे, लेकिन चुनाव में नुकसान जरूर हो जाएगा। दूसरी आशंका यह है कि इन लोगों की अनदेखी को कहीं मतदाता इस रूप में न ले ले कि यह तो सिर्फ वोट हासिल करने की रणनीति है। यदि ऐसा हुआ तो पार्टी को चुनाव में होने वाले नुकसान की भरपाई करना संभव नहीं हो पाएगा।

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