जनाकांक्षाएं पूरा करने के पहल की जरूरतः प्रणव

पटनाः राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने शुक्रवार को कहा कि बिहार और झारखंड एक ऐसे चौराहे पर खड़ा है, जहां से उन्हें जनता की अपेक्षाओं को पूरा करने के लिए सही राह पकड़नी है और समाज को सही दिशा में गतिमान बनाने के लिए राजनीतिक पहल की जरूरत है।
प्रणव मुखर्जी ने यहां एशियन डेवलपमेंट रिसर्च इंस्टीट्यूट (आद्री) के रजत जयंती समारोह का उद्घाटन करने के बाद सत्र को संबोधित करते हुए कहा कि प्रचुर क्षमताओं के बावजूद राजनीतिक और सामाजिक कारणों से दोनों राज्य पिछड़ रहे हैं। दोनों राज्यों की क्षमता एवं विकास की प्राथमिकताओं के बीच व्यापक अंतर रहा है। इस वजह से दोनों राज्य ऐसे चौराहे पर खड़े हैं, जहां से उन्हें ऐसी राह पकड़नी है, जिस पर चलकर वे जनता की आकांक्षाओं को पूरा कर सकते हैं। उन्होंने कहा कि इतिहास गवाह है कि इन लक्ष्यों की प्राप्ति समाज को गतिमान बनाकर और राजनीतिक पहल से की जा सकती है। राष्ट्रपति ने कहा कि औपनिवेशिक काल की विरासत, आजादी के बाद का विकास पैटर्न, सामाजिक बदलाव, लगातार हुए पलायन, जाति आधारित राजनीति, पर्यावरण एवं पारिस्थितिकी, राष्ट्रीय स्तर पर पहचान का प्रश्न और सामाजिक न्याय की मांग कुछ ऐसे कारण रहे, जिसकी वजह से आज बिहार और झारखंड प्राकृतिक संसाधनों की प्रचुरता के बावजूद जनता की आकांक्षाएं पूरी नहीं कर पा रहे हैं। राष्ट्रपति ने कहा, ‘हमें विकास के लाभ से अछूते रहे बिहार और झारखंड जैसे राज्यों के बारे में गंभीरता से विचार करना होगा। नीति निर्माताओं को इन क्षेत्रों के बारे में विकास की ऐसी रणनीति तैयार करनी होगी कि ये राज्य अर्थव्यवस्था के विकास में अपनी क्षमता के अनुरूप भागीदारी सुनिश्चित कर सकें। ऐसे राज्यों को आंख मूंदकर केवल उद्योगीकरण के मार्ग पर चलने से बचना होगा।’ उन्होंने कहा कि इन राज्यों में आर्थिक विकास को बढ़ावा देने के लिए इनके मानव संसाधन की अपार क्षमता पर ध्यान देना होगा। दुनिया में कुछ ऐसे उदाहरण हैं, जो बताते हैं कि पिछड़े क्षेत्रों के विकास के लिए वहां के मानव संसाधन का विकास वैकल्पिक रणनीति हो सकती है। इसके तहत इन क्षेत्रों के अकुशल मानव संसाधन को प्रशिक्षण देकर वस्तु एवं सेवाओं का कुशल प्रदाता बनाया जा सकता है। विकास की इस वैकल्पिक रणनीति के अंतर्गत शिक्षा के क्षेत्र में प्राथमिकता के आधार पर निवेश बढ़ाना होगा। उन्होंने कहा कि शिक्षा का यह कतई अर्थ नहीं है कि केवल शिक्षित व्यक्ति को ही आर्थिक लाभ होगा बल्कि इससे लोग सशक्त होंगे, जिससे विकास कार्यक्रमों और राजनीतिक प्रक्रियाओं में इनकी भागीदारी को बढ़ावा मिलेगा।

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