शबरी पर श्रीराम की कृपा

जिसने भी रामचरितमानस और नवधा भक्ति के बारे में पढ़ा हैं वे श्रीराम की भक्त शबरी के नाम से अनजान नहीं होंगे। दण्डकारण्य में एक वृद्ध भीलनी शबरी रहती थी। एक दिन वह यूं  भटकती हुए मतंग वन में   मतंग मुनि के  अति सुंदर आश्रम में आ गई। अनाथ शबरी को मुनि का आश्रय मिला तथा  प्रभु श्रीराम के ज्ञान और भक्ति का श्रवण पान भी मिला। वह प्रभु की भक्ति में लीन होकर आश्रम के सभी कार्य बड़े लग्न और प्रेम से  करती थी। मंतग मुनि भी उसकी भक्ति और निष्ठां से अति प्रसन्न थे। जब उनका अन्तिम सण आया तो उन्होंने उसे आदेश दिया –‘शबरी, तुम यही रहना, यहां श्रीराम और लक्ष्मण पधारेंगे। श्रीराम परब्रह्म हैं, उनका दर्शन कर तुम्हारा जीवन सफल हो जायेगा। तुम्हें नवधा भक्ति के बारे में ज्ञान भी उन्हीं से मिलेगा। ‘ यह सुनकर शबरी के मन में प्रभु श्रीराम की भक्ति और  दर्शन की लौ जल उठी। वह नित प्रभु  की प्रतीक्षा में आश्रम के प्रवेश द्वार तक से मार्ग को बुहारती, गंगाजल के छींटे देती और पूरे  मार्ग को  रंग-बिरंगे खुशबूदार फूलों से आच्छादित कर देती। उनके आदर -सत्कार  के लिए प्रतिदिन वनों से तजा-तजा कंद-मूल फल इकट्ठे करके लाती। अगर कोई पूछता तो वो पगली कहती –‘मेरे  प्रभु श्रीराम  आएंगे, मुझे दर्शन देने जरूर आएंगे. ..।’और सचमुच वह शुभ दिन भी आ गया। एक दिन प्रभु श्रीराम सीता की खोज में भटकते-भटकते अपने अनुज भ्राता लक्ष्मण के साथ उसके आश्रम में पहुंच ही गए। सिद्ध तपस्विनी शबरी भाव -विवह्ल होकर श्रद्धा  से हाथ जोड़कर दोनों को प्रणाम किया और  प्रभु के चरणों से लिपट गई। बार-बार अपने जीवन को  धन्य कहने लगी। श्रीराम ने गद् -गद् भाव से शबरी को उठाया। तब शबरी ने कहा –‘हे रघुनंदन ! आज आपके  दर्शन पाकर मुझे  अपनी तपस्या में सिद्धि प्राप्त हो गई और मेरा जन्म भी सार्थक हो गया, क्योंकि आपके  इस आश्रम में आपकी पगधूलि और पदार्पण से मेरी वर्षों की तपस्या और इंतजार सफल हुआ। अब मुझे आपकी कृपा से निःसंदेह आपके दिव्यधाम की प्राप्ति होगी।’ ऐसा कहकर शबरी ने दोनों भाईयों को कंदमूल फल आदि खाने को दिए। शबरी इतनी भावविभोर हो गई थी कि उसे लगा कि की कोई बेर खट्टे न हो इसलिए मुंह से चखकर जूठे, पर मीठे बेर खाने को दिए। भगवान भी तो भाव के भूखे हैं वे भी माता शबरी के जूठे बेर भी बड़े मजे लेकर खाते  रहे जबकि लक्ष्मण ने उसे  श्रीराम की निगाह बचाकर फेंक दिए थे,पर प्रभु ने देख लिया था।  जो कालंतर में संजीवन बूटी बनकर उनके प्राण बचाने  में सहभागी बना। कंद मूल फल सरस् अति दिए राम कहुं आनि।      प्रेम सहित प्रभु खाए ,बारबार बखानि।।इस प्रकार प्रभु का स्वागत करके शबरी ने पुनः कहा –‘हे सौम्य ! आपके प्रसाद से ही अब मैं अक्षय लोकों में जाउंगी ‘फिर कहने लगी –अधम ते अधम  अधम अति नारी।  तिन्ह महं मैं मतिमंद आघारी। तब भक्तवत्सल श्रीराम ने कहा –‘हे भामिनि, मैं तो केवल भक्ति का ही  संबंध मानता हूं। जाति-पाति, धर्म, बड़े, धन-बल, कुटुम्ब, गुण और चतुराई इन सबके होने पर भी भक्ति रहित मनुष्य जलहीन बादल -सा लगता है। तुम तो सभी प्रकार (नवधाभक्ति -नौ प्रकार की भक्ति )की भक्ति रखती हो। उसी के फलस्वरूप तुम्हें मेरे दर्शन हुए, जिनसे तुम सहज स्वरूप को प्राप्त करोगी। ‘फिर उन्होंने भक्ति के नौ रूपों के बारे में बताकर उन्हें भक्ति के स्वरूपों से अवगत कराया। तदन्तर उन्होंने माता शबरी से अपनी प्रिया जनकसुता नन्दनी  सीता के विषय में पूछा तो शबरी ने उन्हें पम्पासरोवर के पार जाने के  लिए कहते हुए बताया कि –‘प्रभु !वहां वानरराज सुग्रीव से आपकी मित्रता होगी। वही सब हाल बताएंगे। ‘फिर हँसते हुए बोली –हे रघुबीर ! आप अंतर्यामी होकर भी मुझसे पूछ रहे हैं ?’चरणों में  बार-बार सिर नवाकर और प्रभु के दर्शन करके कृतार्थ होते हुए श्रीराम के चरणों को हृदय में धारण कर  योगाग्नि द्वारा शरीर त्याग दिया। इस प्रकार वह प्रभु चरणों में लीन  हो गयी। – प्रांशुल सिंगड़ोदिया

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