मेहनत और लगन

असेंबली में  आयुष को फूट-फूटकर रोता देख निकुंज की आंखें भी भर आयी थीं। दोनों बहुत ही अच्छे क्लासमेट थे, पर इस बार वह अनुत्तीर्ण  होकर नौवीं कक्षा में  ही रह गया था जबकि वह पास होकर दसवीं कक्षा में आ गया था। कुछ और बच्चे भी फेल हुए थे सब दूसरे सेक्शन में थे वह अकेला अलग सेक्शन में था और अपने को बहुत अनकम्फर्ट फील कर रहा था।  पिछले महीनों में सभी टेस्टों में दोनों की परफार्मेंस ठीक नहीं थी इसलिए सुचिता मेम ने  बाकी बच्चों के साथ  उन दोनों को समझाते हुए कहा कि –‘अभी भी 3 महीने का टाइम हैं तुमलोग चाहो तो मेहनत और परिश्रम करके अच्छे नंबरों से पास होकर दसवीं क्लास में जा सकते हों। आगे तुम्हारी इच्छा। ‘ आयुष ने तो इस बात को मजाक में उड़ा दिया लेकिन निकुंज बहुत ही डर गया क्योंकि अर्द्धवार्षिक परीक्षा में सचमुच  वह कुछ अंकों के अंतर से फेल था। घर पर मम्मी -पापा से भी डांट पड़ी ,ट्यूशन टीचर ने भी डांटा अब क्लास टीचर ने भी  समझाया तो उसे अपने ऊपर काफी शर्म आई और उसने मन में ठान लिया कि वह मन लगाकर पढ़ेगा और अच्छे नंबरों से पास होकर नयी कक्षा में  जरूर जायेगा। यह उसका  खुद का अपने से वादा था। यही बात जब उसने आयुष से कही तो वह हंसने लगा –‘अरे भाई !सब ठीक हो जायेगा। इतना क्यों घबड़ा रहा है। अभी एक्ज़ाम में बहुत देरी है तब तक तो चिल्ल कर। ‘और कैंटीन में मजे ले-लेकर पिजा-बर्गर खाने लगा। वह हर- रोज  टिफिन की जगह पैसे लाता था और चटकारे लेकर केंटीन की चीजें खाता जबकि निकुंज अपनी  मम्मी का बनाया टिफिन ही लाता और वहीं खाता था। आयुष हमेशा उसे अपने साथ खाने का आग्रह करता  तो वह मना कर देता। कहता कि बाहर की चीज खाने से उसका पेट खराब हो जाता है. अब  क्लास में जो टीचर जो सब्जेक्ट पढ़ाती थी. बहुत ही मन लगाकर और बहुत ही ध्यान से  सुनता और पढ़ता तथा ट्यूशन टीचर से भी जबतक पूछता रहता जबतक की वह विषय उसे समझ में नहीं आ जाता  या याद न हो जाता।   उसने घर में भी खेलने व सेल्फ स्टडी के लिए समयतालिका बना ली थी और उसको फॉलो करते हुए वह बहुत ही लगन के साथ अपने पास होने के गंतव्य की और बढ़े जा रहा था। क्लास में सब यूनिट टेस्टों में उसके मार्क्स देखकर समझ में आने लगा था कि निकुंज मेहनत कर  रहा है क्योंकि मेम ने हँसते हुए कहा था कि –लगता है कि इस बार तुम्हारी मेहनत रंग ला रही है। ‘अपनी इस सफलता से वह बहुत खुश था जबकि आयुष के मार्क्स बहुत ही पुअर आये थे और इस बार तो पैरेंट्स कॉल भी हुआ था। तब भी  उसके एटीट्यूड में रत्ती-भर भी फर्क नहीं आया था वह तो बेलौस कैंटीन से पूरी-भाजी खरीद कर खा रहा था। जब मेम उसकी मम्मी को कह रही थी तो मुंह में रुमाल रखकर मुस्करा रहा था। पर जब उसकी मम्मी ने डांटा तो वह रुंआसा हो उठा।  अवकाश के समय निकुंज दूसरे लड़कों की तरह खेलकूद न करके अपनी घर ट्यूशन टीचर का होमवर्क कर  लेता था तब आयुष अन्य लड़कों के साथ  उसकी  पढ़ाई के प्रति एकाग्रता भंग करने की कोशिश करता लेकिन वह बुरा नहीं मानता। मुस्कराकर दूसरी जगह जाकर बैठ जाता था और पढ़ने लगता था।  निकुंज खाली समय में एक-दो बार समझाने कि कोशिश भी की  कि -‘-अगर स्कूल में भी हमारा ध्यान पढ़ाई में न हो तो सोचो कैसे पास हो सकते हैं ?केवल ट्यूशन पर तो डिपेंड नहीं रह सकते ?.. ”आयुष थोड़ा गंभीर हो गया था और बोला –‘हां। अब क्लास में  ध्यान दूंगा।और घर की मैम से भी मन लगाकर पढूंगा। ‘पर लगता था कि उसने  निर्णय लेने में बहुत देर कर दी थी तभी तो वार्षिक परीक्षाओं में  वह बहुत ही परेशान व डरा हुआ था कि वह फेल न हो जाए  और वह फेल हो गया तथा वह अच्छे नंबरों से पास हुआ था जिसका क्रेडिट उसकी मेहनत  व लगन के साथ -साथ उसके मम्मी-पापा को भी जाता था जिन्होंने पढ़ाई में उसकी काफी मदद कीं। उसका हौसला बढ़ाया ताकि वह भविष्य में  कभी भी मेहनत और सफलता से जी न चुराये। – प्रांशुल सिंगड़ोदिया

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