नहीं कटेगा कोई पेड़

“दादी उठो न खाना खा लो। अब तो मान जाओ दादी !” अजय अपने हाथ में खाने की थाली पकड़े दादी को मना रहा था। बात दरअसल यह थी कि बड़े भइया विजय शहर से डाक्टरी पढ़कर गांव में एक अस्पताल खोलना चाहते थे। पापा ने अस्पताल बनाने के लिए आमों की बगिया वाली जगह निर्धारित की थी। उसी बगिया में एक नीम का पेड़ भी था। इस पेड़ को दादी ने कई वर्ष पहले बड़े उत्साह से लगाया था। उसकी एक नन्हे बच्चे की तरह खूब सेवा की थी। अब वह पेड़ खूब बड़ा हो गया था। उस पर बहुत सारे पक्षियों ने अपना घोंसला बना रखा था। विजय के अस्पताल बनाने के लिए बगिया के पेड़ों को काटना जरूरी था। उन्हीं पेड़ों में वह नीम का पेड़ भी था, जो दादी को बहुत प्रिय था।
जब से दादी को पता लगा था कि अस्पताल बनाने के लिए बगिया के पेड़ों को काटा जायेगा और उन पेड़ों के साथ उनका प्यारा नीम का पेड़ भी काट दिया जायेगा, उसी दिन से दादी उदास रहने लगीं थीं। उन्होंने खाना त्याग दिया था। सबने उन्हें बहुत समझाया कि गांव में अस्पताल खुलने से बीमार गांव वालों को शहर नहीं भागना पड़ेगा। कभी-कभी तो व्यक्ति इतना बीमार हो जाता था कि उसे शहर पहुंचते-पहुंचते ही अपनी सांसें छोड़नी पड़ जाती थीं। दादी को भी गांव में अस्पताल खुल जाने की बहुत खुशी थी और उससे ज्यादा खुशी इस बात की थी कि उनका पोता ही गाव में अस्पताल खोलकर उनका नाम रोशन करने वाला था। लेकिन उन्हें दुख इस बात का था कि उन्होंने नीम के पेड़ को भी तो अपने बच्चे की तरह पाला था। उसके साथ भी उनकी स्नेह से भरी भावनाएं वैसी ही थीं जितनी और जैसी विजय के साथ। पेड़ के खोने का दर्द वह अपने दिल से निकाल नहीं पा रहीं थीं।
नन्हा अजय जब अपने नन्हे हाथों में खाने की थाली लेकर आया तो दादी अपने आप को रोक न सकीं और फफककर रो पड़ीं। उन्हें रोता देखकर अजय भी रोने लगा। रोते-रोते उसने कहा कि मत रो दादी। मुझसे कोई गलती हो गई हो तो मुझे माफ कर दो। आपने कल से खाना नहीं खाया है। मैं इसीलिए आपके लिए खाना लेकर आया हूं। यदि आप खाना नहीं खाओगी तो मैं भी नहीं खाऊंगा। नन्हे अजय की बातें सुनकर दादी ने कहा कि ऐसा मत कह मेरे बच्चे, तू अपनी दादी के लिए खाना लाया है तो तेरी दादी जरूर खाना खायेगी। उन्होंने थाली उसके हाथ से लेकर खाना खाना शुरू कर दिया।
परसों विजय आने वाला था। उसे अस्पताल के लिए जगह देखकर उसका नक्शा बनवाना था। उसके आगमन की तैयारी में सभी लोग लगे थे। अम्मा ने उसके लिए कई प्रकार की मिठाई और पकवान बनाने शुरू कर दिए थे। गांव के लोग भी डाक्टर साहब के आने से बेहद खुश थे। इन सब तैयारियों में तीन दिन कहां बीत गए , किसी को पता ही नहीं लगा। सुबह 10 बजे की बस से डाक्टर विजय गांव आने वाला था। पिताजी और गांव के बहुत से लोग सुबह ही गांव के बस अड्डे पर पहुंच गए थे। बस एक घंटा लेट आई। विजय जैसे ही बस से नीच उतरा ,गांव वालों की भीड़ ने उसे चारो ओर से घेर लिया। लेकिन विजय की आंखे इतनी भीड़ में अपने पिताजी को ढूंढ रहीं थीं। उसने देखा कि उसके पिताजी भीड़ में सबसे पीछे खड़े हैं। वह लपककर भीड़ को चीरता हुआ पिताजी के पास पहुंचा और उनके चरणों को छूकर उनके गले से लिपट गया। पिता और पुत्र दोनों की आंखों से अपार खुशी की निर्मल धाराएं बह निकली। रूंधे गले से पिताजी सिर्फ इतना ही कह पाए कि हमें तुम पर गर्व है बेटा ! आज तुमने न केवल मेरा , वरन सारे गांव का नाम रोशन कर दिया है। पिताजी की बात को सुनकर विजय ने कहा कि यह सब तो आपके आशीर्वाद और आपके त्याग का परिणाम है पिताजी। आपने अथक मेहनत करके हमें पढ़ाया और इस काबिल बनाया कि आपका विजय हर क्षेत्र में विजयी हो।
घर पहुंचने पर उसने सबसे पहले दादी के चरणों का स्पर्श करके आशीर्वाद लिया और फिर अम्मा के चरणों को छूकर उनके गले से लिपट गया। अम्मा को आज ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो वह अभी भी नन्हा सा बच्चा है। खाना खाते समय बातों ही बातों में अजय ने विजय भइया को दादी के खाना न खाने वाली बात बता दी। सारी बात अम्मा ने विजय को बताई तो उसने कहा कि दादी बिलकुल ठीक कह रही हैं। हमें बगिया के हरे भरे पेड़ काटकर अस्पताल नहीं बनाना चाहिए। वैसे ही इस धरती से पेड़ों को लगातार काटकर पर्यावरण को नष्ट किया जा रहा है। बाढ़ , भूकम्प , अकाल, मौसम में लगातार होने वाले परिवर्तन के लिए हम सब जिम्मेदार हैं। धरती पर बढ़ रही लगातार गर्मी का कारण भी पेड़ों का अभाव ही है। पेड़ ही तो हैं जो कार्बन डाई ऑक्साइड को ग्रहण करके शुद्ध ऑक्सीजन हम सब प्राणियों को प्रदान करते हैं। यदि पेड़ ही नहीं होंगे तो हम सबको सांस लेने के लिए शुद्ध वायु कहां से मिलेगी ? कुछ पल रूककर विजय ने कहा कि मैं सोचता हूं कि कुछ ऐसा हो जाए कि अस्पताल भी बन जाए और पेड़ भी न काटना पड़ें। विजय की इस बात को सुनकर दादी जोर से चहककर बोलीं, यदि ऐसा हो जाए तब तो बहुत ही अच्छा हो जाएगा बेटा ! शाम को विजय पिताजी के साथ बगिया देखने गया। बगिया में आम के कई पेड़ थे। बगिया के कोने में एक नीम का बड़ा सा पेड़ था। यह वही पेड़ था जो दादी को बहुत प्रिय था। इसी पेड़ के लिए दादी बहुत परेशान थीं। सारी बगिया देखने के बाद विजय ने पिताजी से कहा कि पिताजी, मैं अस्पताल का नक्शा इस प्रकार बनवाऊंगा कि एक भी पेड़ नहीं काटना पड़ेगा और अस्पताल भी बन जाएगा। एक पेड़ से दूसरे पेड़ की दूरी बहुत ज्यादा है। अस्पताल के लिए कमरे पेड़ों के बीच खाली पड़ी जमीन पर बहुत आराम से बन जायेंगे। इन पेड़ों के कारण अस्पताल में न केवल छाया रहेगी वरन इनसे अस्पताल की सुंदरता भी बढ़ जायगी। मैं इस नीम के पेड़ के चारों ओर एक बड़ा सा चबूतरा भी बनवा दूंगा। जिससे दादी के प्यार और बलिदान से फलीभूत हुए इस पेड़ नीचे गांव के लोग आराम से बैठकर पेड़ के द्वारा दी जाने वाली स्वच्छ हवा का अनुभव कर सकें।
घर जाकर जब विजय ने दादी को अपनी योजना के बारे में विस्तार से बताते हुए कहा कि आपका नीम का पेड़ कभी नहीं कटेगा बल्कि वह भी आपकी तरह सबको और अस्पताल के मरीजों के जल्द स्वस्थ होने की कामना का आशीष देगा तो दादी की खुशी का ठिकाना न रहा। उन्होंने लपककर विजय को अपने गले से लगाते हुए कहा कि जुग-जुग जियो मेरे लाल। भगवान तुम्हें खूब तरक्की दे।

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