जब यमदूत को शीर्षासन करना पड़ा

गं  गा के किनारे जगदीशपुर नाम का एक गांव था। वहां एक बुढ़िया रहती थी। वह बहुत गरीब थी। उसके पास 5 कठ्ठा बलुआही जमीन थी। उसीं में वह तरबूज उगाकर अपना जीवन-निर्वाह कर रही थी। उसकी एक विवाहित पुत्री थी, जिसे उसके पति ने छोड़ दिया था। वह  अब अपनी माँ के  साथ ही रहती थी।
शरारती बच्चे प्रायः तरबूज चुराकर ले जाते तो बुढ़िया आजिज होकर उन्हें जी-भरकर गालियां बकती थीं। एक बार गर्मी के दिन थे। एक साधु महाराज उधर से गुजर रहें थे। उन्हें प्यास लगी तो रुककर बुढ़िया से पानी मांगा। बुढ़िया पहले तो डरी कि कही ये साधु बाबा तरबूज न मांग बैठे। पर पानी मांगने पर बड़े प्रेम से घड़े से ठंडा पानी निकालकर, साधु महाराज को पिलाया तो वे बड़े तृप्त हुए और बोले -‘वर मांगो।’
बुढ़िया ने कहा –‘महाराज ! मैं तो चोरों से परेशान हूँ। यह वर दीजिए कि जो कोई मेरा तरबूज तोड़े ,वह सिर के बल लटक जाये और जब मैं उसे मुक्त होने का कहूं, तभी सीधा  सीधा चल पाये। ‘-साधु महाराज ने -‘ऐसा ही हो।’ कहा। और चले गये। जगत सिंह गांव का चौकीदार था जो बहुत ही रंगबाज था, किसी का भी सामान उठा लेता और कोई कुछ भी नहीं कह पाता था। एक दिन उसने बुढ़िया के जमीन से तरबूज तोड़ा। दूसरे ही क्षण वह सिर के बल लटक गया। बुढ़िया ने देखा तो खूब जी-भरकर गलियां सुनाई। लोग जमा हो गये। बुढ़िया बोली –‘जा मुए, अब ऐसी हरकत मत करना। जो मेरे जमीन से तरबूज तोड़ेगा, उसकी यही हालत होगी। ‘
चौकीदार सिर पर पैर रखकर भागा। यह चर्चा सारे गांव में फैल  गयी। अब कोई भी बुढ़िया के तरबूज की ओर आंख उठाकर  देखता नहीं  था, तोड़ना तो दूर की बात थी। एक दिन दो यमदूत बुढ़िया को लेने आये, क्योंकि उसकी अन्तिम घड़ी आ गई थी। उसने यमदूतों से मिन्नत की कि –‘मेरी लड़की अकेली है ,मुझे अभी छोड़ दो। ‘-पर कौन सुनता ? अन्त में बुढ़िया बोली -‘चलो, पर मेरी एक इच्छा है तरबूज खाने की। ‘
एक यमदूत तरबूज तोड़ने गया और उल्टा लटक गया। उसको देखकर बुढ़िया निश्चित हो गई। उसकी ऐसी हालत देखकर दूसरा यमदूत तो  भाग गया और यमराज को जाकर बताने लगा । सारी घटना सुनकर यमराज चकराए। वे तुरन्त भैंसे पर सवार होकर आये। उनके भैंसे ने देखा कि हरी-हरी पत्तियां फैली हैं। उसने खाने के लिए मुंह लगाया, बस चारों  खाने चित्त। भैंसा भी शीर्षासन करने लगा। यमराज बोलें –‘देवि, इन्हें मुक्त करो और कोई वरदान ले लो।’
बुढ़िया बोली –‘इस स्थान पर मैं 10 साल तक अपने नाती (बेटी के बेटा )को छत पर बैठकर चांदी की कटोरी में दूध -भात खिलाऊं। ‘–यमराज ने तथास्तु कहा। और अपने गण तथा अपने वाहन के साथ चलते बने। एक दिन गलती से राजकुमार ने भी तरबूज को तोड़ना चाहा तो उल्टा लटक गया। वह बहुत उदंड था। सारी प्रजा ,यहां तक राजा -रानी भी उसकी शरारतों से परेशान थे। उल्टा लटकने से राजकुमार बहुत भयभीत हो गया। उसने रोते हुए प्रण किया कि अब वह किसी को भी परेशान नहीं करेगा  और शरारत भी नहीं करेगा । तब बुढ़िया ने उसको मुक्त कर दिया। अपने बेटे को सुधरा हुआ देखकर राजा बहुत प्रसन्न हुआ। उसने बुढ़िया के लिए सुंदर घर बना दिया तथा रूपये-पैसे भी दिए। फिर बुढ़िया का  दामाद भी आकर रहने लगा। कुछ दिनों के बाद उसे नाती भी प्राप्त हो गया। बुढ़िया की सभी इच्छा पूर्ण हो गई और वह ख़ुशी-ख़ुशी अपने परिवार के साथ
रहने लगी।

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