और पुरु हारकर भी जीत गया

ईसा पूर्व यूनान में मकदूनिया के युवा महत्वाकांक्षी और साहसी राजा सिकन्दर  ने भारत पर आक्रमण किया। वह बड़ी आसानी से भारत के प्रवेशद्वार से वापस खदेड़ दिया जाता अगर तक्षशिला का मगरूर राजा आम्भि उसका स्वागत न करता। देशद्रोही आम्भि कोई अपरिचित आगन्तुकों की मेहमाननवाजी का शौकीन नहीं था बल्कि अपने पड़ोसी राजा पुरु को परास्त करना चाहता था,जो झेलम नदी के किनारे एक समृद्ध और शांत राज्य का शासक था। दुष्ट आम्भि ने अन्य राजाओं को भी आक्रामक को नजराना देने के लिए अपने दरबार में आमंत्रित किया। कायर राजाओं ने तो आमंत्रण स्वीकार कर लिया पर साहस और पौरुष तथा आत्मसम्मान और बहादुरी के प्रतीक पुरु इसके अपवाद थे। उस काल में भारतीय राजा युद्ध में आक्रमण करने या अपनी रक्षा करने के लिए हाथियों का प्रयोग करते थे और यह बात यूनानियों को नहीं पता थी कि इन विशाल अनुशासित पशुओं का सामना कैसे करें ?  इस पर राजा आम्भि ने उन्हें हाथियों से मुकाबला करने की कला सिखा दी। तब सिकंदर अपनी विशाल सेना के साथ झेलम नदी की ओर बढ़ा  और एक किनारे पर अपना तंबू गाड़ दिया क्योंकि झेलम पार करना आसान नहीं था। जैसे ही इसकी सेना नाव पर बैठती थी कि पुरु की सेना उस पर आक्रमण कर देती। ऐसे में नदी के बीच यूनानी सेना के लिए अपनी रक्षा करना मुश्किल था। इसलिए सिकन्दर ने अपनी रणनीति में थोड़ा बदलाव कर दिया। वह बस नदी पार करने का केवल बहाना करता रहा और दूसरी तरफ आम्भि की सहायता से कम पानी वाले मार्ग से अधिकांश को पैदल उस पार भेज दिया या फिर कहते है कि जब पुरु की सेना नींद में निमग्न थी तब रात को झेलम नदी को पार करके सिकन्दर उस पार पहुंच गया। सा पूर्व यूनान में मकदूनिया के युवा महत्वाकांक्षी और साहसी राजा सिकन्दर  ने भारत पर आक्रमण किया। वह बड़ी आसानी से भारत के प्रवेशद्वार से वापस खदेड़ दिया जाता अगर तक्षशिला का मगरूर राजा आम्भि उसका स्वागत न करता। देशद्रोही आम्भि कोई अपरिचित आगन्तुकों की मेहमाननवाजी का शौकीन नहीं था बल्कि अपने पड़ोसी राजा पुरु को परास्त करना चाहता था,जो झेलम नदी के किनारे एक समृद्ध और शांत राज्य का शासक था। दुष्ट आम्भि ने अन्य राजाओं को भी आक्रामक को नजराना देने के लिए अपने दरबार में आमंत्रित किया। कायर राजाओं ने तो आमंत्रण स्वीकार कर लिया पर साहस और पौरुष तथा आत्मसम्मान और बहादुरी के प्रतीक पुरु इसके अपवाद थे। उस काल में भारतीय राजा युद्ध में आक्रमण करने या अपनी रक्षा करने के लिए हाथियों का प्रयोग करते थे और यह बात यूनानियों को नहीं पता थी कि इन विशाल अनुशासित पशुओं का सामना कैसे करें ?  इस पर राजा आम्भि ने उन्हें हाथियों से मुकाबला करने की कला सिखा दी। तब सिकंदर अपनी विशाल सेना के साथ झेलम नदी की ओर बढ़ा  और एक किनारे पर अपना तंबू गाड़ दिया क्योंकि झेलम पार करना आसान नहीं था। जैसे ही इसकी सेना नाव पर बैठती थी कि पुरु की सेना उस पर आक्रमण कर देती। ऐसे में नदी के बीच यूनानी सेना के लिए अपनी रक्षा करना मुश्किल था। इसलिए सिकन्दर ने अपनी रणनीति में थोड़ा बदलाव कर दिया। वह बस नदी पार करने का केवल बहाना करता रहा और दूसरी तरफ आम्भि की सहायता से कम पानी वाले मार्ग से अधिकांश को पैदल उस पार भेज दिया या फिर कहते है कि जब पुरु की सेना नींद में निमग्न थी तब रात को झेलम नदी को पार करके सिकन्दर उस पार पहुंच गया। इस प्रकार शत्रु की चालाकी से मात खाए पुरु ने अपनी बहादुर सेना के साथ यूनानी विजेता का सामना किया। पूरे  दिन युद्ध होता रहा आम्भि की सेना का समर्थन प्राप्त सिकंदर से पोरस  की बेमेल लड़ाई थी। इस प्रकार पुरु की 20 हजार सैनिक  से भी अधिक युद्धभूमि में मारे गये। एक वक्त ऐसा था, जब बहादुर पोरस सूर्यास्त के समय अकेला ही शत्रु से घिरा उन्हें गाजर-मूली की तरह काट रहा था। किसी को उसे बंदी बनाने का साहस नहीं था। सिकन्दर उसके साहस और संकल्प पर दांतों तले उंगली दबाने लगा। अंत में उसने आम्भि को उसके पास आत्मसमर्पण कर देने का संदेश  देकर भेजा। कायर आम्भि भय से कांपते हुए पुरु की ओर बढ़ा। –‘मेरी नजरों से दूर हो जाओ, कायर, धोखेबाज !’ पोरस उसपर चीखा। आम्भि डर से खिसक गया। पुरु गंभीर रूप से घायल था। उसके शरीर और सिर  की चोटों से रक्त बह रहा था, फिर भी उसके मुख पर दुःख या ग्लानि के कोई चिह्न नहीं थे। सिकन्दर की सेना ने उसे घेरकर बंदी बनाकर सिकन्दर के सामने प्रस्तुत किया गया। उन्हें पूर्ण विश्वास था कि सिकन्दर इस अभागे बंदी का सिर काट लेगा, क्योंकि वह अपने शत्रुओं को कभी माफ़ नहीं करता था। इसके अलावा वह सनकी भी था। एक बार उसका एक मित्र बीमार पड़ गया था। चिकित्सकों ने उसे बर्फ के साथ शराब पीने और मांस खाने से मना किया था। लेकिन उसका बीमार मित्र पीता खाता रहा और मर गया। सिकन्दर ने सभी चिकित्सकों को मौत के घाट उतार दिया। उसने गांव की पूरी आबादी को मौत की नींद इसलिए सुला दिया कि उनकी आत्माएं मित्र की आत्मा का साथ दें सकें। उसकी निर्ममता के ये हैं कुछ दृष्टांत !सिकन्दर ने फारस पर फतह करते समय कितने ही राजाओं का गर्व चूर-चूर कर दिया था ,किन्तु उसने पुरु जैसा जाबांज व्यक्ति नहीं देखा था जो उसके साथ द्वन्द्व युद्ध के लिए भी तैयार मालूम पड़ता था। सिकन्दर अपने श्रेष्ठ कैदी के साहस और वीरता से बेहद प्रभावित हो गया। वह निःसंदेह जनता था कि आंभी की दगाबाजी न होती तो वह युद्ध में कभी मुंह की न खाता !  ‘अच्छा राजा पुरु ! अब जबकि युद्ध समाप्त हो चुका है और तुम असहाय  हो, तुम्हारे साथ केसा बर्ताव किया जाये ? उसने पूछा। ‘सिकन्दर, यदि तुम सचमुच एक राजा हो ,तो तुम्हें मालूम होना चाहिए कि दूसरे राजा के साथ कैसे बर्ताव किया जाता हैं। ‘ राजा पुरु ने पूरे  आत्मविश्वास से भरकर जवाब दिया। ‘सचमुच ! तुम्हारे साथ उसी सम्मान के साथ व्यवहार किया जायेगा जो एक राजा के योग्य है। क्या तुम्हें कुछ और चाहिए ?’  उसके उत्तर से प्रभावित सिकन्दर ने एक बार और पूछा। ‘नहीं ! और कुछ नहीं, क्योंकि यदि मुझे तुम राजा का सम्मान दोंगे  तो मेरी जरूरत की हर चीज उसमें शामिल होगी। राजा पुरु ने कहा। सिकन्दर को यह उत्तर बहुत पसन्द आया। उसने उसका राज्य वापस लौटा दिया। कहने की आवश्यकता नहीं है कि पुरु के असाधारण साहस ,वीरता और आत्म-गौरव के भाव ने ही सिकन्दर को अभिभूत कर दिया था। मनुष्य के सद्गुणों का इतना प्रभाव पड़ता है कि शत्रु भी उसके प्रभाव से नहीं बच पाते। राजा पुरु और सिकन्दर एक दूसरे के उदात्त व्यवहार से प्रसन्न थे किन्तु दुष्ट आम्भि संतुष्ट न था उसके तो मंसूबों पर पानी फिर गया था।

– संजय अग्रवाल

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