ईमानदारी की सजा

किसी गांव में श्यामू नाम का एक व्यक्ति रहता था। गांव के पीपल के नीचे उसका टूटा-फूटा घर था। वह बहुत ही मिलनसार और ईमानदार था। वह गांव में काम मांगकर थक चुका था। तब किसी ने उसे पास के शहर में जाकर पैसे कमाने की सलाह दी। एक सुबह जब वह शहर के लिये निकला तो उसका मन थोड़ा भारी हो रहा था। उसके घर पर एक बांसुरी थी, जो उसे जान से प्यारी थी। उसके मन में विचार आया कि मेरे न रहने पर कहीं मेरी बांसुरी चोरी न हो जाए। उसने घर आकर पड़ोस में रहने वाले रामू को बांसुरी देते हुए कहा—‘मैं नौकरी की तलाश में शहर जा रहा हूँ। तुम मेरी यह बांसुरी धरोहर के रूप में अपने पास संभालकर रखना। मैं शहर से लौटकर अपनी बांसुरी तुमसे
मांग लूँगा।’
रामू ने बांसुरी लेकर अपने पास रख ली। श्यामू शहर जा पहुंचा और उसे वहां नौकरी मिल गयी। वह बड़ी मेहनत से काम करता और पैसे बचाकर जोड़ता। कुछ महीने बाद वह शहर से धन कमाकर अपने गांव लौट आया। गांव आते ही सबसे पहले रामू के घर जा पहुंचा। वह शहर से उसके लिये अच्छी मिठाई लेकर आया था। कुछ देर बातें करने के बाद उसने अपनी बांसुरी मांगी। रामू बोला—‘मैंने तुम्हारी अनुपस्थिति में बांसुरी को बहुत संभालकर रखा। लेकिन एक दिन एक साधु बाबा आये और उनकी नजर बांसुरी पर पड़ी। वह जिद पर अड़ गये कि मैं बांसुरी लिये बगैर यहां से नहीं जाऊँगा। मैं भला उन्हें कैसे नाराज कर सकता था। इसलिए मैंने उन्हें वह बांसुरी दे दी।’ श्यामू बोला—‘खैर कोई बात नहीं।’ वह समझ चुका था कि रामू उसके साथ दगाबाजी कर रहा है। वह बांसुरी देना नहीं चाहता है, क्योंकि इससे पहले रामू के कभी भली दरवाजे पर आये हुए साधु-संतों को कुछ नहीं दिया। वह सीधे गांव के पुलिस थाने जा पहुंचा। वह दरोगा से बोला—‘साहब, मेरी बांसुरी मेरे पड़ोसी रामू ने हड़प ली है। उसे वापस पाने के लिये मैंने एक युक्ति सोची है क्या इसमें आप मेरा साथ देंगे?’ श्यामू की सारी बातें सुनकर दरोगा उसका साथ देने के लिये तैयार हो गया। दूसरे ही दिन रामू के दरवाजे पर दो साधु आकर खड़े हाे गये। उनमें से एक साधु ने कहा—‘बेटा, मैं तुम्हारा भविष्य जानता हूँ। इस वक्त तुम्हारे ग्रहों की दशा ठीक नहीं चल रही है। तुम्हारे ऊपर बहुत बड़ा संकट आने वाला है। तुम्हारे पास एक बांसुरी है, जिसकी वजह से तुम्हें जेल जाना पड़ सकता है। बेहतर यही होगा कि तुम मुझे वह बांसुरी दे दो।’ रामू सोचने लगा कि मेरे पास बांसुरी है, यह बात साधु कैसे जानते हैं। ये वाकई में बहुत पहुंचे हुए साधु जान पड़ते हैं। कहीं ऐसा न हो कि मैं इस बांसुरी के कारण किसी संकट में पड़ जाऊँ। रामू साधु को बांसुरी देकर निश्चिंत हो गया। कुछ देर बाद थाने के दरोगा उसे बुलाने आ पहुंचे तो उसके होश उड़ गये। वह थाने में पहुंचा। थाने में दरोगा की मेज पर साधु को दी गयी बांसुरी देखकर वह आश्चर्य में पड़ गया। दरोगा बोला—‘सच बताओ, तुम किसी की बांसुरी हड़पना चाहते थे न?’
रामू बोला—‘मेरी तो कुछ भी समझ मे नही आ रहा है कि यह बासुरी यहां कैसे आ गई? यह तो साधु के मांगने पर मैं उन्हें दे चुका था। वह साधु बाबा इसे यहां क्यों छोड़ गये?’ दरोगा बोला—‘तुम्हारे पास जो दो साधु आये थे, उनमें एक मैं था और दूसरा वह था, जिसकी तुम बांसुरी हड़पना चाहते थे।’ रामू हैरान होकर बोला—‘अरे, यह सब चक्कर क्या है?’ दरोगा बोला—‘अब तो तुम स्वीकार करते हो कि तुमने श्यामू की बांसुरी हड़पने की कोशिश की। दरअसल, चोरी स्वीकार करवाने के लिये ही हम लोगों को यह सब नाटक करना पड़ा।’ रामू ने अपनी गलती मान ली तो दरोगा ने कहा—‘रामू तुम्हें कम से कम एक दिन हवालात में बंद करना होगा।’ इस पर रामू ने कहा—‘मुझे मेरी बांसुरी मिल गई है। इसके लिये श्यामू को कोई सजा नहीं मिलनी चाहिए।’ श्यामू ने रोते-रोते कहा—‘दरोगा जी, मुझसे बहुत बड़ी भूल हो गई है। अब मैं ऐसा कभी नहीं करूँगा।’

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